मुंबई से संचालित होता था डिजिटल अरेस्ट गिरोह, विदेश यात्रा से लेकर ट्रांजेक्शन तक पर रखते थे नजर
राजस्थान के भंवर से पकड़े गए साइबर ठग राकेश पटेल से तकनीकी टीम को पूछताछ में कई चौंकाने वाली जानकारियां हाथ लगी हैं। पता चला है कि यह गिरोह महाराष्ट्र में किराए के फ्लैट को एक ‘डिजिटल अरेस्ट स्टूडियो’ के रूप में इस्तेमाल करता था। इन फ्लैटों में फर्जी कोर्ट रूम, क्राइम ब्रांच और सीबीआई ऑफिस जैसे सेटअप तैयार किए जाते थे, जहाँ से वीडियो कॉल के माध्यम से लोगों को डराकर ठगी की जाती थी।
स्थानीय एजेंटों से हासिल किए गए सिम कार्ड का प्रयोग कर यह शातिर गिरोह डॉक्टरों, इंजीनियरों, व्यवसायियों और अन्य बड़े लोगों का डेटा चुराता था। इस डेटा में उनकी यात्राओं का विवरण, बड़े वित्तीय लेनदेन और संदिग्ध संपत्ति जैसी महत्वपूर्ण जानकारी शामिल होती थी। इस जानकारी का इस्तेमाल कर ठग अपने शिकारों को आसानी से अपने जाल में फंसा लेते थे। यह पता लगाया जाता था कि कौन कब किन देशों की यात्रा कर रहा है, किसने भारी-भरकम ट्रांजैक्शन किया है, या कौन गलत तरीके से संपत्ति अर्जित कर रहा है।
एसएसपी हृदय कांत के निर्देश पर डीएसपी कनिष्क श्रीवास्तव के नेतृत्व में साइबर थाना की टीम पकड़े गए राकेश के नेटवर्क और उसे संरक्षण देने वाले सफेदपोशों की कुंडली खंगालने में जुटी हुई है। इस गिरोह के सदस्य शिकार से मिले पैसों को वैध बनाने के लिए विभिन्न कारोबारों में निवेश करते थे। रकम पहले सऊदी अरब और दुबई में संपर्कों के खातों में भेजी जाती थी, जहाँ से क्रिप्टो करेंसी की मदद से इसे होटल, एयरलाइन और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में लगाया जाता था। मजबूत नेटवर्क और सफेदपोशों के संरक्षण के कारण इनकी गतिविधियां लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहीं।
तकनीकी जांच में यह भी सामने आया है कि डिजिटल अरेस्ट के शिकारों के खातों से लाखों रुपये बिना किसी आवश्यक सत्यापन के निकाल लिए गए। कुछ बैंक कर्मियों ने भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए संदिग्ध राशियों के हस्तांतरण को भी आसानी से अंजाम दिया। भागलपुर में एक महिला प्रोफेसर डॉ. निर्मला कुमारी सहित दर्जनभर मामलों में बैंक कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। साइबर थाना की टीम अब इन कर्मियों की पहचान कर उनके गिरोह से संबंधों की जांच आगे बढ़ा रही है।
