मतदाताओं का असंतोष: समस्तीपुर में 62 प्रत्याशी नोटा से भी हारे
समस्तीपुर, बिहार। बिहार विधानसभा चुनाव में समस्तीपुर जिले में एक असाधारण चुनावी परिदृश्य देखने को मिला, जहाँ 108 प्रत्याशियों में से 62 उम्मीदवार नोटा (नन ऑफ द एबव) से भी कम वोट पाकर चुनाव हार गए। यह आंकड़ा जिले में मतदाताओं के बढ़ते असंतोष और उम्मीदवारों के प्रति उनकी उदासीनता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
जिले की 10 विधानसभा सीटों पर हुए मुकाबले में, नोटा ने भी एक मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। कुल 22 लाख मतदाताओं में से लगभग 11 प्रतिशत यानी 42 हजार 875 मतदाताओं ने किसी भी प्रत्याशी को वोट न देकर नोटा का बटन दबाया। यह संख्या 2020 के चुनाव में पड़े 29 हजार 848 नोटा वोटों से 13 हजार 27 अधिक है, जो मतदाताओं के रुख में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। हालांकि, 2015 की तुलना में यह संख्या कम रही है, जब पहली बार बिहार में नोटा का प्रयोग शुरू हुआ था।
कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र में नोटा को सर्वाधिक 8634 वोट मिले, जहाँ नोटा चौथे स्थान पर रहा। वहीं, विभूतिपुर में 10, वारिसनगर में 9, समस्तीपुर व मोहिउद्दीनगर में 8-8, हसनपुर में 7, कल्याणपुर, उजियारपुर व मोरवा में 5-5, सरायरंजन में 4 और रोसड़ा में एक प्रत्याशी नोटा को भी पछाड़ नहीं सके। समस्तीपुर, वारिसनगर, हसनपुर, विभूतिपुर, मोहिउद्दीनगर, सरायरंजन और मोरवा में नोटा पांचवें स्थान पर रहा।
विशेषज्ञों के अनुसार, नोटा के वोटों में यह वृद्धि उम्मीदवारों की छवि, चुनावी मुद्दों और राजनीतिक दलों के प्रति मतदाताओं के बढ़ते असंतोष का परिणाम है। यह दिखाता है कि मतदाता अब केवल वोट डालने के लिए नहीं, बल्कि अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए भी मतदान का प्रयोग कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रवृत्ति को नजरअंदाज करना दलों के लिए महंगा साबित हो सकता है।
यह स्थिति राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के चयन, प्रचार रणनीतियों और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने के लिए विवश करती है। मतदाताओं के असंतोष को दूर करने और उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए राजनीतिक दलों को जमीनी स्तर पर अधिक मेहनत करनी होगी, अन्यथा नोटा का प्रभाव भविष्य के चुनावों में और भी बढ़ सकता है।
