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मैकाले की विरासत को तिलांजलि: भारत की सांस्कृतिक स्वाभिमान की ओर एक बड़ा कदम

By Dec 2, 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के अपने महत्वाकांक्षी संकल्प को साकार करने के लिए देशवासियों से पांच प्रण लेने का आग्रह किया है। इन प्रणों में एक प्रमुख है – औपनिवेशिक मानसिकता से पूर्ण मुक्ति। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए, उन्होंने अगले दस वर्षों के भीतर थॉमस बाबिंगटन मैकाले की शिक्षा नीति की विरासत को तिलांजलि देने की आवश्यकता पर बल दिया है। मैकाले, जिन्हें अंग्रेजियत का प्रतीक माना जाता है, की शिक्षा योजना ने भारतीय भाषाओं, संस्कृति और सभ्यता को गंभीर रूप से क्षति पहुंचाई थी। प्रधानमंत्री ने इस गंभीर समस्या की पहचान की है और अब यह भारतीय नागरिकों का कर्तव्य है कि वे मिलकर अगले दशक में मैकाले की सोच के नकारात्मक प्रभावों से भारत को मुक्त कराएं और भारतीय भाषाओं तथा संस्कृति को उनका उचित गौरव वापस दिलाएं।

मैकाले ने 1835 में सार्वजनिक शिक्षा निदेशक के रूप में एक ऐसी विस्तृत योजना बनाई थी, जिसका उद्देश्य अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देना और भारतीय भाषाओं एवं सभ्यता की जड़ों को कमजोर करना था। इस योजना के फलस्वरूप देशभर में कान्वेंट स्कूलों का प्रसार हुआ और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा उपेक्षित होती चली गई। मैकाले का मानना था कि संस्कृत एक ‘व्यर्थ’ की भाषा है और भारतीयों को अंग्रेजी सीखनी चाहिए, क्योंकि यह श्रेष्ठ सभ्यता और आधुनिक ज्ञान की कुंजी है। उन्होंने भारतीय भाषाओं को ‘दरिद्र और अशिष्ट’ बताते हुए कहा था कि यूरोपीय साहित्य के मुकाबले इनका कोई मूल्य नहीं है।

यह दृष्टिकोण उस समय के भारत की समृद्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक विरासत की घोर उपेक्षा थी। मैकाले शायद इस बात से अनभिज्ञ थे कि भारत ने शून्य की खोज की थी और आर्यभट्ट तथा भास्कराचार्य जैसे महान गणितज्ञों और खगोलशास्त्रियों को जन्म दिया था। आर्यभट्ट ने 1500 साल पहले ही ज्यामिति, त्रिकोणमिति के साथ-साथ पृथ्वी, चंद्रमा और ग्रहों के व्यास की सटीक गणना कर ली थी, साथ ही सूर्य और चंद्र ग्रहणों की वैज्ञानिक व्याख्या भी की थी। वहीं, भास्कराचार्य ने 900 साल पहले ही कलन (कैलकुलस) और ग्रहों की अंडाकार कक्षाओं जैसे जटिल सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था। मैकाले जैसे व्यक्ति के लिए इन उपलब्धियों को नजरअंदाज करना आसान था, क्योंकि उनका उद्देश्य ही भारतीयों को अपनी जड़ों से काटना था।

मैकाले की रणनीति भारतीयों को ‘रंग और खून से भारतीय, लेकिन विचार, पसंद और बुद्धि से अंग्रेज’ बनाने की थी। उन्होंने अंग्रेजी और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने मार्च 1835 में एक आदेश जारी कर सरकारी धन का उपयोग केवल अंग्रेजी माध्यम से पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सुनिश्चित किया, जिससे मैकाले के एजेंडे को और बल मिला। अब, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान और भाषाई समृद्धि को पुनः प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है।

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