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लोकपाल कानून में सुधार की आवश्यकता, सरकार कर सकती है नियमों पर पुनर्विचार

By Nov 24, 2025

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को और मजबूत करने के उद्देश्य से बनाए गए लोकपाल कानून में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, सरकार इस कानून के कुछ नियमों पर पुनर्विचार करने की योजना बना रही है, ताकि इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सके और इसमें किसी भी प्रकार की मनमानी या देरी की गुंजाइश को समाप्त किया जा सके।

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013, जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 1 जनवरी, 2014 को अस्तित्व में लाया गया था, ने 27 मार्च, 2019 को अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के बाद अपना कार्यभार संभाला था। वर्तमान में, भारत के लोकपाल के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अजय माणिकराव खानविलकर हैं। लोकपाल में एक अध्यक्ष के अलावा आठ सदस्य हो सकते हैं, जिनमें चार न्यायिक और चार गैर-न्यायिक सदस्य शामिल हैं।

सूत्रों ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में, अध्यक्ष ने मामलों की सुनवाई के लिए सभी सदस्यों वाली एक पूर्ण पीठ के साथ-साथ स्वयं की अध्यक्षता वाली एकल पीठ का गठन कर मामलों का निपटारा करने का निर्णय लिया है। हालांकि, मौजूदा कानून में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर निर्णय लेने के लिए दो या दो से अधिक न्यायिक और गैर-न्यायिक सदस्यों वाली अलग-अलग पीठों को काम करने की अनुमति देने का प्रावधान है। सरकार का मानना है कि इस प्रावधान का अधिक कुशलता से उपयोग किया जा सकता है ताकि लंबित मामलों का तेजी से निपटारा हो सके और न्याय सुनिश्चित हो सके।

यह पुनर्विचार इस बात पर जोर देता है कि कानून के निर्माण के बाद से बदली परिस्थितियों और प्राप्त अनुभवों के आलोक में, समय-समय पर कानूनों की समीक्षा और उनमें आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोकपाल संस्था अपनी पूरी क्षमता से काम कर सके और आम जनता का विश्वास बनाए रख सके। सरकार द्वारा इन सुधारों पर विचार किया जाना, भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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