लिपिकीय भूल: निर्दोष युवक को मिली एक साल जेल की सज़ा, हाईकोर्ट ने कलेक्टर पर ठोका भारी जुर्माना
मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में एक गंभीर लिपिकीय त्रुटि के कारण 26 वर्षीय युवक सुशांत बैस को एक साल से अधिक समय तक सलाखों के पीछे रहना पड़ा। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना तब हुई जब जिला कलेक्टर केदार सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत एक गिरफ्तारी का आदेश जारी किया, लेकिन आदेश में वास्तविक आरोपी नीरजकांत द्विवेदी की जगह गलती से सुशांत बैस का नाम लिख दिया गया।
इस गंभीर चूक के कारण सुशांत बैस को 4 सितंबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था और वह 9 सितंबर 2024 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा रिहाई के आदेश के बाद ही जेल से बाहर आ सके। यह पूरा एक साल और चार दिन का समय उन्होंने इस त्रुटि के कारण जेल में बिताया।
मामले की गंभीरता को समझते हुए, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने इस पर कड़ा संज्ञान लिया। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने इस मामले को मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन करार दिया। न्यायालय ने इस मामले में लापरवाही बरतने पर शहडोल के तत्कालीन जिला कलेक्टर केदार सिंह को अवमानना का नोटिस जारी किया है। साथ ही, पीड़ित सुशांत बैस को मानसिक पीड़ा और अन्याय के मुआवजे के तौर पर दो लाख रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया है। न्यायालय ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए, यह कहते हुए कि गिरफ्तारी के आदेश को मंजूरी देने से पहले उसकी ठीक से जांच नहीं की गई।
सुशांत बैस के पिता हीरामनी वैश्य ने इस अन्याय के खिलाफ जबलपुर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने इस घटना को “दिमाग का इस्तेमाल न करने वाला मामला” बताते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी की।
पीड़ित सुशांत बैस का कहना है कि उन्हें रेत ठेका कंपनी सहकार ग्लोबल के प्रभाव में फंसाया गया है। उनका यह भी मानना है कि एक साल से अधिक समय जेल में बिताने की मानसिक पीड़ा की भरपाई दो लाख रुपये के मुआवजे से नहीं हो सकती। उन्होंने मांग की है कि इस मामले में केवल कलेक्टर ही नहीं, बल्कि पुलिस अधीक्षक (एसपी) को भी सजा मिलनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी गलतियाँ दोबारा न हों। सुशांत ने अपने पिता के संघर्ष की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने ही इस कानूनी लड़ाई को लड़ा।
मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को निर्धारित की गई है, जहाँ जुर्माने के क्रियान्वयन और अन्य पहलुओं पर विस्तृत चर्चा होगी। हालांकि, अभी तक उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर आदेश अपलोड नहीं हुआ है, जिससे जुर्माने की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अधिवक्ता रवींद्र गुप्ता के अनुसार, आदेश अपलोड होने के बाद जुर्माने की राशि और उसके भुगतान की प्रक्रिया स्पष्ट होगी।
