करोड़ों खर्च, फिर भी नोएडा की हवा रेड जोन में, प्रदूषण पर नियंत्रण बेअसर
नोएडा में वायु प्रदूषण की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है, जहां करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद शहर पिछले पांच सालों से ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) के रेड जोन में फंसा हुआ है। प्रदूषण नियंत्रण दिवस पर भी हवा की गुणवत्ता में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं देखा गया, जो अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में, अक्टूबर से फरवरी के बीच नोएडा के निवासी जानलेवा हवा में सांस लेने को मजबूर रहे हैं। इस दौरान लागू की गई पाबंदियां पूरी तरह से बेअसर साबित हुई हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत पिछले तीन वर्षों में मिले 55 करोड़ रुपये के बजट में से मात्र सात करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके हैं। शहर में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) को बेहतर बनाने और उद्योगों में ग्रीन एनर्जी के प्रति जागरूकता फैलाने के प्रयासों में कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
स्थिति की गंभीरता इस बात से और बढ़ जाती है कि पिछले नौ वर्षों में प्रदूषण फैलाने वाली निर्माण साइट्स पर 28,00,24,375 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया, लेकिन इसकी वसूली मात्र एक करोड़ रुपये ही हो सकी है। यह कुल जुर्माने का केवल तीन प्रतिशत है। इसी तरह, वर्ष 2025 में जनवरी से नवंबर तक 120 निर्माण साइट्स पर 60,443,500 करोड़ का जुर्माना लगाया गया, जिसमें से केवल 10 प्रतिशत का ही भुगतान हो पाया है। वर्ष 2025 में 60,443,500 करोड़ के जुर्माने में से महज 64,475,00 लाख की वसूली की गई है। वहीं, 2017 से 2024 तक 84,00,731,25 की वसूली की गई है। जुर्माने की इस नगण्य वसूली से प्राधिकरण और संबंधित बोर्ड की लापरवाही साफ झलकती है।
नोएडा स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2025 में भी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सका। तीन से 10 लाख की आबादी वाले शहरों की श्रेणी में नोएडा को नौंवी रैंक मिली, जो कि संतोषजनक नहीं है। सूत्रों के अनुसार, प्रदूषण को कम करने के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई की जा रही है, जिसका सीधा खामियाजा शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है। जिम्मेदारों की ढिलाई के कारण प्रदूषण फैलाने वालों पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा है, और हवा की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद धूमिल होती जा रही है।
