कर्नाटक कांग्रेस में सत्ता संघर्ष: आलाकमान के सामने मुश्किल दांव-पेच
कर्नाटक की सत्ता में कांग्रेस की अंदरूनी कलह एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। मुख्यमंत्री सिद्दरमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर जारी खींचतान ने पार्टी आलाकमान के लिए एक जटिल स्थिति पैदा कर दी है। दोनों नेता अपने-अपने दावों को लेकर अड़े हुए हैं, जिससे पार्टी के लिए कोई भी निर्णय लेना आसान नहीं रह गया है।nnसूत्रों के अनुसार, मई 2023 में मुख्यमंत्री बने सिद्दरमैया अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री शिवकुमार ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले के तहत अब मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं। ऐसी चर्चाएं हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने 2023 के चुनाव से पहले ऐसा ही कोई फॉर्मूला तय किया था। हालांकि, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के अनुभव बताते हैं कि ऐसे फॉर्मूले हमेशा सफल नहीं होते। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के बाद सरकार गिर गई थी, जबकि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी, भले ही वहां के नेताओं ने ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले की मांग की थी।nnआलाकमान के लिए यह निर्णय लेना ‘इधर कुआं, उधर खाई’ जैसी स्थिति है। सिद्दरमैया, जो 77 वर्ष के हैं, के मुकाबले 63 वर्षीय शिवकुमार युवा माने जा रहे हैं। लेकिन क्या शिवकुमार अगले चुनाव तक इंतजार करने को तैयार होंगे, यह एक बड़ा सवाल है। कांग्रेस की यह अंतर्कलह भाजपा के लिए अवसर बन सकती है, जो दक्षिण भारत में अपने गढ़ कर्नाटक को वापस पाने की फिराक में है। डीके शिवकुमार, जो साधन-संपन्न माने जाते हैं, कांग्रेस के लिए संकटमोचक रहे हैं। सवाल यह उठता है कि यदि आलाकमान अपना कथित वादा नहीं निभाता है, तो क्या शिवकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह अपना सकते हैं?nnआलाकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कोई भी फैसला जोखिम मुक्त नहीं है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यदि शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो सिद्दरमैया भाजपा के साथ जा सकते हैं। यह भी गौरतलब है कि सिद्दरमैया मूल रूप से कांग्रेसी नहीं हैं। उनकी पृष्ठभूमि लोकदल से जुड़ी है और वह जनता दल (सेक्युलर) में भी रह चुके हैं। एचडी देवेगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी से टकराव के चलते ही उन्हें कांग्रेस में आना पड़ा था। ऐसे में, जातीय समीकरण और नेताओं की निष्ठाएं कांग्रेस के लिए बड़े मुद्दे बने हुए हैं।”
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निर्णय को और अधिक जटिल बना रही हैं।
