कंटेंट क्रिएशन की लत: युवा पीढ़ी के भविष्य पर मंडराता गंभीर खतरा
आजकल सोशल मीडिया पर कंटेंट क्रिएशन का जुनून युवाओं के बीच एक गंभीर लत का रूप लेता जा रहा है, जिसका सीधा असर उनकी शिक्षा और भविष्य पर पड़ रहा है। कुछ मिनटों की प्रसिद्धि और त्वरित लोकप्रियता की चाहत, युवाओं को मानसिक अवसाद, नशे की लत और शैक्षणिक गिरावट की ओर धकेल रही है।
राजधानी के प्रमुख मनोरोग संस्थानों में हर हफ्ते ऐसे 25 से 30 नए युवा पहुंच रहे हैं, जो या तो गहरे अवसाद से ग्रस्त हैं या नशे के आदी हो चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन मामलों में सोशल मीडिया की लत एक मुख्य कारण के रूप में सामने आई है। क्लीनिकल अध्ययनों से पता चला है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक समय बिताने वाले युवा कम समय में अधिक लोकप्रियता हासिल करने की उम्मीद करते हैं। रील्स बनाने, वीडियो पोस्ट करने, या नए ट्रेंड्स को कॉपी करने के माध्यम से वे रातों-रात लाखों लाइक्स और फॉलोअर्स पाने का सपना देखते हैं।
हालांकि, वास्तविकता इससे कोसों दूर है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे युवाओं में से शायद 10,000 में से केवल एक ही सफल हो पाता है। बाकी युवा लगातार असफलता, तुलना और नकारात्मक टिप्पणियों से टूट जाते हैं। इस निराशा से उबरने के लिए कई युवा नशे का सहारा लेते हैं, जिसकी भनक माता-पिता को तब तक नहीं लग पाती जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए।
वरिष्ठ मनोचिकित्सकों के अनुसार, सोशल मीडिया बच्चों की पढ़ाई, नींद, एकाग्रता और मानसिक विकास को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। कई बार बच्चे ऐसे कंटेंट को अकेले में देखते हैं जो माता-पिता के साथ देखना उचित नहीं होता। यह आदत उनके मस्तिष्क के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। युवा अपनी वास्तविक पहचान को भूलकर डिजिटल दुनिया की नकली प्रसिद्धि के पीछे भाग रहे हैं। लगातार उत्तेजक कंटेंट देखने से उनका दिमाग तेज उत्तेजना का आदी हो जाता है, जिससे पढ़ाई में एकाग्रता पूरी तरह खत्म हो जाती है।
इसके परिणामस्वरूप, उनकी शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट, व्यवहार में चिड़चिड़ापन, समाज से अलगाव, नींद की कमी और धीरे-धीरे अवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। यह भी देखा गया है कि कई बच्चे देर रात तक, यहां तक कि सुबह 1 से 4 बजे तक भी फोन का इस्तेमाल करते हैं। माता-पिता को लगता है कि वे पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि वे गुप्त रूप से रील्स या अन्य उत्तेजक कंटेंट देख रहे होते हैं।
इस डिजिटल खतरे को देखते हुए, ऑस्ट्रेलिया ने 2024 में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था। वहीं, डेनमार्क ने 7 नवंबर 2025 से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। सरकार का तर्क है कि बच्चों की नींद खराब हो रही है, ध्यान भटक रहा है और वे हिंसक व आत्मघाती कंटेंट के संपर्क में आ रहे हैं। भारत में भी 18 वर्ष तक सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठने लगी है।
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