जिस चुनाव को छोड़ने का सोचा, उसी ने श्रीप्रकाश जायसवाल को बनाया दिग्गज
1999 के लोकसभा चुनाव के कुछ ही दिन बचे थे जब कांग्रेस नेता श्रीप्रकाश जायसवाल की उम्मीदें लगभग टूट चुकी थीं। उन्हें लग रहा था कि भाजपा के दिग्गज जगतवीर सिंह द्रोण के सामने जीत की राह मुश्किल है, खासकर 1998 के चुनाव में भारी अंतर से मिली हार के बाद। लेकिन, अंतिम क्षणों में उनके करीबी सलाहकारों ने उन्हें हार न मानने और पूरी ताकत से चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया।
इस प्रेरणा ने श्रीप्रकाश जायसवाल को फिर से सक्रिय किया। सीमित समय के बावजूद, उन्होंने अपनी टीम को एकजुट किया और अंतिम तीन दिनों तक कांग्रेसियों ने सड़कों और बूथों पर पूरी ताकत झोंक दी। इस अप्रत्याशित और जोरदार संघर्ष का नतीजा यह हुआ कि श्रीप्रकाश जायसवाल ने न केवल चुनाव जीता, बल्कि एक ऐसा रिकॉर्ड भी अपने नाम किया जो लंबे समय तक कायम रहा।
श्रीप्रकाश जायसवाल कानपुर संसदीय सीट से लगातार 15 वर्षों तक सांसद चुने गए। किसी भी राजनीतिक दल से इतने लंबे समय तक सांसद रहने का यह एक बड़ा कीर्तिमान था। हालांकि एसएम बनर्जी 20 साल तक निर्दलीय सांसद रहे, लेकिन जायसवाल का रिकॉर्ड राजनीतिक दल के सांसद के तौर पर अद्वितीय था। 1999 में जगतवीर सिंह द्रोण को हराने के बाद, उन्होंने 2004 में सत्यदेव पचौरी को 5,638 वोटों से, और 2009 में सतीश महाना को 18,906 वोटों से पराजित कर अपनी स्थिति मजबूत की।
वे कांग्रेस के साथ-साथ अन्य राजनीतिक दलों में भी एक प्रमुख हस्ती बन गए थे। हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनाव में परिदृश्य बदल गया। उस चुनाव में भाजपा ने पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी को मैदान में उतारा और श्रीप्रकाश जायसवाल को 2,22,946 वोटों के बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा। 2019 का चुनाव उनके लिए अंतिम साबित हुआ। इस बार उन्हें व्यक्तिगत रूप से सर्वाधिक 3,13,003 वोट मिले, लेकिन सत्यदेव पचौरी ने उन्हें 1,55,934 वोटों से हरा दिया। इन लगातार हारों के बाद, श्रीप्रकाश जायसवाल ने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से खुद को दूर कर लिया।
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