IAS विनय कुमार चौबे पर आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी का आरोप, FIR दर्ज
रांची में एक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे पर आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगे हैं। इन आरोपों के आधार पर उनके और छह अन्य व्यक्तियों के खिलाफ जगरनाथपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। इस घटनाक्रम से प्रशासनिक महकमे में हलचल मच गई है, और पुलिस मामले की गहन जांच में जुटी है।
दर्ज प्राथमिकी में विनय कुमार चौबे के अलावा विनय सिंह, स्निग्धा सिंह, बैंक मैनेजर अरविंद वर्मा, विशाल सिंह, राजेश कुमार सिन्हा और राजीव कुमार झा को आरोपित बनाया गया है। शिकायतकर्ता दीपक कुमार ने अपने लिखित आवेदन में लगभग 20 वर्ष पुराने एक विवाद और वित्तीय अनियमितताओं का पूरा ब्यौरा पुलिस को सौंपा है।
शिकायत के अनुसार, दीपक कुमार की मुलाकात वर्ष 2000 में विनय कुमार सिंह से हुई थी, जिसके बाद दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध बने। दिसंबर 2002 में, उन्होंने मिलकर ‘नेक्सजेन सल्यूशन टेक्नोलाजी प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी की स्थापना की, जिसमें वे दोनों डायरेक्टर थे। कंपनी का कारोबार तेजी से बढ़ने लगा, जिसके बाद विनय कुमार सिंह ने दीपक का परिचय आइएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे से कराया।
दीपक का आरोप है कि आइएएस अधिकारी चौबे ने उनके व्यापार और आय को देखकर लोभवश कथित तौर पर एक साजिश रची और कंपनी पर कब्जा करने की योजना बनाई। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि चौबे ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अपने भाई (जो अब मृत हैं) मनोज कुमार चौबे को दीपक की एक अन्य कंपनी ‘फांट सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड’ में पदस्थापित कराया। वर्ष 2006 में, कंपनी को पलामू और अन्य जिलों के अस्पतालों में मशीन व उपकरण आपूर्ति का बड़ा कार्यादेश मिला।
दीपक का आरोप है कि इसी दौरान आरोपितों को व्यवसाय से होने वाली मोटी कमाई का अंदाजा हो गया और उन्होंने दीपक को संगठन से बाहर निकालने की रणनीति बनाई। शिकायतकर्ता के अनुसार, विनय कुमार सिंह ने पहले उनके शेयरों का एक हिस्सा उनकी अनुमति के बिना हस्तांतरित करने का प्रयास किया और बैंक में हस्ताक्षर पैटर्न बदलने की कोशिश की। हालांकि, बैंक से पत्राचार के कारण यह प्रयास विफल रहा।
इसके बाद, वर्ष 2006 में, दीपक के जाली हस्ताक्षर बनाकर विनय कुमार सिंह की पत्नी स्निग्धा सिंह को कंपनी का डायरेक्टर बना दिया गया और बैंक खाते से अवैध निकासी शुरू कर दी गई। दीपक ने यह भी आरोप लगाया है कि 6 नवंबर 2006 को उनके नाम से फर्जी पत्र बैंक और कंपनी के साझेदारों को भेजे गए, जिससे करोड़ों रुपये की क्षति हुई। अंततः, आरोपितों ने कथित तौर पर उन्हें धमकाकर एक एमओयू पर हस्ताक्षर करवाए, जिसमें 15 लाख रुपये देने का वादा किया गया था, लेकिन यह भुगतान कभी नहीं हुआ।
पुलिस फिलहाल सभी आरोपों की जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की सत्यता का पता चलेगा और आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में एक उच्च पदस्थ अधिकारी के नाम आने से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
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