आगरा फोर्ट का ‘गजनी दरवाजा’: सोमनाथ का नहीं, महमूद गजनवी के मकबरे का है सच
आगरा फोर्ट में स्थित एक विशाल दरवाजा, जिसे ऐतिहासिक रूप से सोमनाथ मंदिर का बताकर प्रचारित किया गया था, वह वास्तव में महमूद गजनवी के मकबरे से संबंधित है। यह दरवाजा प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1842) के बाद बंगाल नेटिव आर्मी द्वारा अफगानिस्तान के गजनी से लाया गया था। अंग्रेजों ने भारतीय जनमानस की सहानुभूति प्राप्त करने के उद्देश्य से इसे सोमनाथ मंदिर से लूटा गया बताकर दुष्प्रचार किया था।
यह भ्रामक प्रचार करीब छह दशक तक चला, जब तक कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने इसके वास्तविक स्रोत का खुलासा नहीं किया। वर्तमान में, यह दरवाजा आगरा फोर्ट में दीवान-ए-खास के पास एक कक्ष में प्रदर्शित है। इसके बाहर लगे शिलापट्ट पर इसे गजनी स्थित महमूद गजनवी के मकबरे का दरवाजा बताया गया है, हालांकि एक छोटा शिलापट्ट अभी भी इसे सोमनाथ का दरवाजा दर्शाता है।
इस दरवाजे को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड एलेनबरो ने 1025 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर से लूटे गए चंदन के दरवाजे के रूप में प्रचारित किया था, जिसे 800 वर्ष पुराने अपमान का बदला बताया गया। इस प्रचार के कारण यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर इसका स्वागत हुआ। आगरा में पड़ाव के दौरान यह दरवाजा यहीं रह गया।
सर जॉन मार्शल ने अपने शोध (1902-28) में स्पष्ट किया कि यह दरवाजा सोमनाथ मंदिर का नहीं, बल्कि गजनी के मकबरे का है। इसका निर्माण स्थानीय देवदार की लकड़ी से हुआ है और इसकी कलाकृति प्राचीन गुजराती शैली से भिन्न है। ऊपरी भाग में अरबी में महमूद गजनवी की पदवियां अंकित हैं। आजाद भारत में सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के समय इसे वहां लगाने पर विचार हुआ था, लेकिन सच्चाई सामने आने पर यह योजना त्याग दी गई।
यह ‘गजनी दरवाजा’ 16.5 फीट ऊंचा और 13.5 फीट चौड़ा है, जिसका वजन लगभग आधा टन है। इसमें कीलों का प्रयोग नहीं किया गया है और यह ज्यामितीय आकृतियों को जोड़कर बनाया गया है। इस कलाकृति का सत्य सामने आने से इतिहास की एक गलत धारणा को सुधारा गया है, जो आम जनता के ऐतिहासिक ज्ञान को प्रभावित करती है।
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