गोरखपुर एम्स में ब्रांडेड दवाओं का बोलबाला, मरीज परेशान, हजारों का खर्च
गोरखपुर एम्स में मरीजों को इलाज के साथ-साथ महंगी दवाओं के बोझ तले दबना पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, एम्स में डॉक्टरों द्वारा ब्रांडेड दवाएं लिखने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जबकि जेनरिक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। इससे मरीजों को मजबूरी में महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों पर भी दवाओं की उपलब्धता न के बराबर है, जिससे मरीजों की परेशानी और बढ़ गई है।
मामलों की पड़ताल में सामने आया कि डॉक्टर ब्रांडेड दवाएं लिखकर न केवल सरकारी नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, बल्कि मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ भी डाल रहे हैं। बिहार के सिवान की 66 वर्षीय मीना देवी, जो मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, को एम्स गोरखपुर में डॉक्टर कनिष्क कुमार ने आठ तरह की दवाएं लिखीं। आदेश जेनरिक दवाओं का था, लेकिन उन्होंने सभी ब्रांड नाम की दवाएं लिखीं। उन्हें एक मेडिकल स्टोर पर किसी तरह पांच दवाएं मिलीं, जिनका मूल्य छूट के बाद 2822 रुपये हुआ। तीन दवाएं उन्हें नहीं मिल सकीं, जिन्हें खरीदने के लिए उन्हें बाहर के मेडिकल स्टोर का रुख करना पड़ा।
इसी तरह, 27 वर्षीय चांदनी गुप्ता को हड्डियों के दर्द के लिए डॉक्टर कनिष्क कुमार ने छह ब्रांडेड दवाएं लिखीं। अमृत फार्मेसी पर केवल कैल्शियम ही मिल सका, बाकी के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ा। महराजगंज के 41 वर्षीय बेचू, जो एक महीने से बुखार से पीड़ित हैं, को भी सीनियर डॉक्टर के जूनियरों द्वारा लिखी गई एक भी दवा एम्स परिसर की फार्मेसी पर नहीं मिली।
यह स्थिति एम्स गोरखपुर में कार्यकारी निदेशक और केंद्र सरकार के निर्देशों की अनदेखी को दर्शाती है। स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, डॉक्टर ब्रांडेड, और कभी-कभी एकाधिकार वाली दवाएं लिख रहे हैं, जिनकी गुणवत्ता पर भी संदेह बना रहता है और जिन पर मनमाना रेट होता है।
एम्स में मीडिया सेल की चेयरपर्सन डॉ. आराधना सिंह ने स्वीकार किया कि ब्रांड नाम से दवा नहीं लिखनी चाहिए और जल्द ही कम्प्यूटराइज्ड पर्चे दिए जाएंगे। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि एम्स परिसर में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (एमआर) का हस्तक्षेप लगातार बना रहता है, जो अपनी कंपनियों की दवाएं लिखवाने के लिए डॉक्टरों पर दबाव बनाते हैं। एम्स प्रशासन एमआर के इस हस्तक्षेप को रोकने में विफल साबित हो रहा है।
अच्छे उपचार और सस्ती दवा की आस में पूर्वांचल, बिहार और नेपाल से आने वाले मरीज यहां महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। कई बार तो महंगी दवाओं के कारण मरीज बिना दवा खरीदे ही वापस लौट जाते हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
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