सार्वजनिक जगह पर जुआ खेलना संज्ञेय अपराध, हाई कोर्ट ने कहा- पुलिस बिना वारंट कर सकती है गिरफ्तार सकती है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थल पर जुआ खेलना एक संज्ञेय अपराध (cognizable offense) है। इस फैसले के तहत, पुलिस ऐसे मामलों में बिना किसी वारंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है और मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना ही जांच (विवेचना) शुरू कर सकती है। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने आगरा निवासी कामरान की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने विचारण कोर्ट को तीन महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का भी निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता कामरान ने विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, आगरा के समक्ष लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। कामरान को दिसंबर 2019 में सिकंदरा स्थित एक पार्क में ताश खेलने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जहाँ से पुलिस ने 750 रुपये बरामद किए थे। पुलिस ने बाद में सार्वजनिक जुआ अधिनियम 1867 की धारा 13 के तहत आरोप पत्र दायर किया था।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जुआ अधिनियम की धारा 13 के तहत पहली बार अपराध के लिए अधिकतम सजा केवल एक महीने का कारावास है। उन्होंने सीआरपीसी का हवाला देते हुए कहा कि तीन साल से कम की सजा वाले अपराध आमतौर पर गैर-संज्ञेय (non-cognizable) होते हैं। इसलिए, पुलिस को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना गिरफ्तारी या विवेचना करने का अधिकार नहीं था। अधिवक्ता ने सीआरपीसी की धारा 155(2) का भी उल्लेख किया, जो गैर-संज्ञेय मामलों में मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना पुलिस जांच को प्रतिबंधित करती है।
हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराधों की परिभाषा के अनुसार, पुलिस अधिकारी बिना वारंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। जुआ अधिनियम की धारा 13 स्पष्ट रूप से पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार देती है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि जुआ अधिनियम की धारा 13 गैर-संज्ञेय अपराध है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 13 के तहत पुलिस को मिला विशिष्ट अधिकार इसे संज्ञेय अपराध बनाता है, भले ही सजा की अवधि कम हो।
