गावस्कर का सवाल: ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर क्यों नहीं उठते सवाल, भारत में क्यों मचे हंगामा?
पर्थ टेस्ट का दो दिनों से भी कम समय में समाप्त होना, जिसमें 32 विकेट गिरे, कई सवाल खड़े करता है। विशेष रूप से, पहले दिन ही 19 विकेट गिरने के बावजूद पिच की गुणवत्ता पर कोई आलोचना नहीं हुई। यह विडंबना ही है कि पिछले साल इसी पर्थ में भारत-ऑस्ट्रेलिया मुकाबले में भी पहले दिन 17 विकेट गिरे थे, लेकिन पिच पर कोई उंगली नहीं उठी। लेकिन जब भारत में ऐसी परिस्थितियाँ बनती हैं, तो तुरंत पिच की आलोचना शुरू हो जाती है।nnदिग्गज भारतीय बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने इस पर अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने अपने कॉलम में लिखा है कि यह उनके लिए सौभाग्य की बात थी कि अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर के शुरुआती वर्ष में ही उन्हें दुनिया की तीन प्रमुख क्रिकेट खेलने वाले देशों की यात्रा का अवसर मिला। वेस्टइंडीज में पदार्पण के बाद इंग्लैंड का दौरा और फिर ऑस्ट्रेलिया का दौरा, यह सब कुछ ही महीनों में हुआ। भारत ने उन दोनों सीरीज में जीत हासिल की, जो इन देशों में भारत की पहली जीत थी।nnऑस्ट्रेलियाई दौरे का अनुभव गावस्कर के लिए अविस्मरणीय रहा। उन्हें सर डान ब्रैडमैन द्वारा रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड टीम में चुना गया था, जिसकी कप्तानी महानतम खिलाड़ियों में से एक कर रहे थे। यह दौरा तब हुआ जब ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने दक्षिण अफ्रीका को पांच टेस्ट मैचों की सीरीज के लिए दिए गए आमंत्रण को रद्द कर दिया था। इस दौरे ने न केवल उन्हें दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका दिया, बल्कि ऑस्ट्रेलिया की एकजुटता को भी करीब से देखने का अवसर दिया।nnगावस्कर ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया की अपनी यात्राओं में उन्होंने कभी किसी ऑस्ट्रेलियाई को अपने देश की कमियों की शिकायत करते हुए नहीं सुना। राजनीतिक मतभेदों के अलावा, ऑस्ट्रेलियाई लोग अपने देश के प्रति गहरा गर्व और एकता दिखाते हैं।nnएक युवा क्रिकेटर के रूप में, गावस्कर ने यह भी अनुभव किया कि उस समय अंपायरिंग कितनी पक्षपाती होती थी। वेस्टइंडीज में, स्थानीय नायकों को आउट देने से बचने के लिए फैसले लिए जाते थे। इंग्लैंड में, यह तब होता था जब टीम मुश्किल में होती थी, और एक गलत फैसला मैच का रुख बदल देता था। ऑस्ट्रेलिया में, यह और भी खुलकर महसूस होता था कि मेजबान टीम को हारता हुआ नहीं दिखना चाहिए, इसलिए अंपायरिंग मेजबान टीम के पक्ष में झुकी रहती थी।nnउन्होंने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि कैसे उपमहाद्वीप के अंपायरों को अंग्रेजी या ऑस्ट्रेलियाई मीडिया द्वारा ‘धोखेबाज’ तक कहा जाता था, जबकि उनकी अपनी अंपायरिंग त्रुटिहीन मानी जाती थी। लेकिन वास्तविकता यह थी कि वहां की अंपायरिंग भी पक्षपात से भरी होती थी। उपमहाद्वीप के अंपायरों की गलतियों को अपमानजनक नाम दिए जाते थे, जबकि विदेशी अंपायरों की गलतियों को ‘मानवीय भूल’ कहकर टाल दिया जाता था। अब जब भारतीय क्रिकेट वैश्विक शक्ति बन चुका है, तो उम्मीद है कि ऐसी पक्षपातपूर्ण आलोचनाओं का दौर समाप्त होगा।”
बदलेगा।”
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