दिल्ली धमाका: आतंकियों ने यूनिवर्सिटी से 500 मीटर दूर लैब में सीखा बम बनाना
दिल्ली में लाल किले के पास कार में हुए धमाके के मामले में जांच एजेंसियों ने एक बड़े आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है। इस साजिश के पीछे अल-फलाह यूनिवर्सिटी के दो छात्र, जिन्हें डॉ. उमर और डॉ. मुजम्मिल के नाम से पहचाना गया है, मुख्य साजिशकर्ता पाए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ये दोनों आतंकी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में आवंटित कमरों में बैठकर देश को दहलाने की योजना बनाते थे, और बम बनाने की ट्रेनिंग यूनिवर्सिटी से मात्र 500 मीटर दूर एक किराए के गोदाम में लेते थे।
जांच एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के अनुसार, ये आतंकी 2022 से सक्रिय थे और 2024 से विस्फोट करने के लिए विस्फोटक सामग्री जुटाना शुरू कर दिया था। डॉ. मुजम्मिल ने धौज गांव में स्थित एक सीमेंट गोदाम के ऊपर बने कमरे को किराए पर लिया था, जो आतंकियों के लिए एक गुप्त ‘लैब’ की तरह काम कर रहा था। इसी कमरे में वे यू-ट्यूब से प्रशिक्षण लेकर बम बनाने की विधि सीखते थे।
30 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर पुलिस और फरीदाबाद पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर इस ठिकाने से भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री बरामद की। बरामदगी में 360 किलो अमोनियम नाइट्रेट, एक असाल्ट राइफल, तीन मैगजीन, 83 कारतूस, एक पिस्टल, दो मैगजीन, आठ कारतूस, आठ बड़े व चार छोटे सूटकेस, 20 टाइमर, चार बैटरी वाले टाइमर, 24 रिमोट, पांच किलो हैवी मेटल, वाकी-टाकी सेट, इलेक्ट्रिक वायरिंग और अन्य सामान शामिल थे।
सूत्रों ने बताया कि अमोनियम नाइट्रेट के साथ अन्य विस्फोटक पदार्थ मिलाने के लिए सामग्री कश्मीर से खरीदी गई थी। जांच एजेंसियों के हाथ 25 सितंबर 2024 के दो ऐसे बिल लगे हैं, जिनमें डिलीवरी कश्मीर से दिखाई गई है। बरामद सूटकेसों में यही विस्फोटक सामान भरा हुआ था। कमरे से परखनली और जार जैसी चीजें भी मिली हैं, जो बम बनाने की प्रक्रिया को दर्शाती हैं।
यह भी पता चला है कि इस साजिश में जैश की महिला विंग से जुड़ी डॉ. शाहीन भी शामिल थी, जो हॉस्टल के कमरों में डॉ. उमर और डॉ. मुजम्मिल के साथ साजिश रचती थी। गोदाम के संचालक ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि डॉ. मुजम्मिल ने 13 सितंबर को यह कमरा किराए पर लिया था। इस मामले में पंचकूला से सीआईडी मुख्यालय के एसपी जितेश गहलावत अपनी टीम के साथ आकर जांच कर चुके हैं। कमरे में गद्दे, कंबल और अन्य सामान भी मौके पर पड़ा मिला था, जो आतंकियों के गुप्त ठिकाने के रूप में इसके इस्तेमाल को साबित करता है।
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