भारतीय भाषाओं के संरक्षण में तकनीक का तालमेल जरूरी: राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोले विशेषज्ञ, AI पर हुई चर्चा
कानपुर में छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज और शिक्षा मंत्रालय भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का मुख्य विषय ‘भारतीय भाषा परिवार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): इक्कीसवीं सदी की चुनौतियां एवं संभावनाएं’ रहा।
इस संगोष्ठी में देश के 14 राज्यों से आए 200 से अधिक शिक्षक और शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की भाषायी विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है और AI के इस युग में इस शक्ति को बनाए रखने के लिए तकनीक के साथ तालमेल बिठाना समय की मांग है।
AI: चुनौती और अवसर दोनों
संगोष्ठी में शामिल हुए विशेषज्ञों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को भारतीय भाषाओं के लिए चुनौती और अवसर दोनों बताया। रांची विश्वविद्यालय के प्रो. जंग बहादुर पाण्डेय ने कहा कि भारतीय भाषाएं और संस्कृति हमारी पहचान हैं, और इस पहचान को बनाए रखने के लिए AI और कंप्यूटर ज्ञान को समझना बेहद जरूरी हो गया है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रो. एस अरुल्मोजी ने कहा कि AI का उपयोग भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए किया जाना चाहिए।
भाषा विशेषज्ञों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना होगा
गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. राकेश चंद्र रयाल ने भारतीय भाषाओं के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि भाषा विशेषज्ञों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना होगा, ताकि वे AI उपकरणों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकें। विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के प्रो. निरंजन जेना ने साहित्य को समाज का दर्पण बताते हुए उसके सामाजिक महत्व पर प्रकाश डाला।
