संविधान की ‘मूल’ प्रस्तावना पर विवाद, Baghpat में DM के फैसले पर क्यों छिड़ी राष्ट्रीय बहस?
उत्तर प्रदेश के बागपत में गणतंत्र दिवस के मौके पर संविधान पार्क में संविधान की मूल प्रस्तावना की प्रतिकृति लगाने को लेकर विवाद गहरा गया है। पार्क के उद्घाटन के बाद से ही सोशल मीडिया पर यह बहस छिड़ी हुई है कि डीएम अस्मिता लाल ने जानबूझकर मौजूदा संविधान की प्रस्तावना से छेड़छाड़ की है। विवाद का केंद्र प्रस्तावना से ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्दों का गायब होना है। ये शब्द आपातकाल के दौरान 1976 में 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़े गए थे।
बागपत की डीएम अस्मिता लाल ने इस विवाद पर स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि पार्क में लगाई गई प्रतिकृति संविधान के पहले ड्राफ्ट की प्रस्तावना पर आधारित है। यह मूल प्रस्तावना है, और इसके शब्दों तथा डिजाइन को हू-ब-हू रखा गया है। हालांकि, सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक आईएएस अधिकारी ने मौजूदा संविधान की जगह पुरानी प्रस्तावना को क्यों प्राथमिकता दी, जबकि केंद्र सरकार ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि उसका 1976 के संशोधन को बदलने का कोई इरादा नहीं है।
यह विवाद केवल बागपत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध राष्ट्रीय राजनीति से है। भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी दल लंबे समय से 42वें संशोधन के जरिए प्रस्तावना में किए गए बदलावों का विरोध करते रहे हैं। पिछले साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बड़े नेता दत्तात्रेय होसबले ने इमरजेंसी की बरसी पर ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग उठाई थी। इसके बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस संशोधन को ‘नासूर’ बताया था।
हालांकि, केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया था कि उसकी संविधान की प्रस्तावना में बदलाव की कोई योजना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी नवंबर 2024 में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की इसी तरह की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था। इस बीच, 26 जनवरी को राज्यमंत्री केपी मलिक ने बागपत के संविधान पार्क का उद्घाटन किया था, जिसे संविधान, नागरिक कर्तव्यों और सामाजिक जागरूकता का प्रतीक बताया गया है।
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