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नेतृत्व की नाकामी से त्रस्त कांग्रेस, उठने लगे सवाल

By Dec 10, 2025

यदि बार-बार की हार भी सबक नहीं सिखा पा रही तो इसमें गलती कांग्रेस समर्थकों की नहीं। राष्ट्र हित में एक ऐसे मजबूत विपक्ष की आवश्यकता है, जिसे जमीनी मुद्दे समझ आएं, न कि ऐसे विपक्ष की, जो अपने मुद्दे जनता पर थोपे।

लगातार चुनावी हार से कांग्रेस त्रस्त है

नेतृत्व की नाकामी पर उठ रहे सवाल

आशीष दुआ। पिछले 15 वर्षों में कांग्रेस ने तीन लोकसभा और लगभग 75 विधानसभा चुनाव लड़े हैं। इन चुनावों में उसके हारने का स्ट्राइक रेट करीब-करीब 80 प्रतिशत है। एक समय लगभग पूरे देश पर राज करने वाली पार्टी की आज केवल तीन राज्यों-कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में ही सरकार है। दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद अब बिहार में विधानसभा चुनाव हारने के बाद यह गारंटी नहीं कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक किसी राज्य में उसकी सरकार बची रहेगी। बिहार में जो परिणाम आए, वे अप्रत्याशित नहीं हैं। जो लोग पार्टी नेतृत्व के कामकाज पर नजर रख रहे थे, उन्हें पता था कि न कामकाज का तरीका बदलेगा और न ही परिणाम।

हरियाणा विधानसभा चुनावों के समय किसने कल्पना की थी कि राज्य में भाजपा तीसरी बार जीत हासिल कर लेगी। यह भी कल्पना से बाहर था कि कांग्रेस 2019 के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने गले में स्वयं पराजय का हार डाल लेगी। जीत को हार में बदलने की ‘कारीगरी’ से न केवल कांग्रेस कार्यकर्ता, अपितु कांग्रेस को वोट देने वाले समर्थकों के साथ बुद्धिजीवी वर्ग भी चिंतित है कि आखिर देश की सबसे पुरानी पार्टी का भविष्य क्या होगा? एक दशक से भी अधिक समय से चुनाव हारने के सिलसिले से अगर कोई चिंतित नहीं तो वह है कांग्रेस का प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर का नेतृत्व।

पिछले 11 वर्षों में कांग्रेस हाईकमान ने स्वयं के बनाए मापदंडों की अनदेखी की है। इसका सटीक उदाहरण है हरियाणा। इस राज्य में 11 साल बाद प्रदेश कांग्रेस कमेटी को जिलाध्यक्ष मिल सके। क्या यह आत्ममंथन का विषय नहीं कि हरियाणा में विधायक दल के नेता के बारे में एक साल तक कोई निर्णय नहीं किया जा सका? आखिर भाजपा सरकार को विरोधी पक्ष का नेता न मिलने का आनंद कांग्रेस नेतृत्व ने क्यों दिया? हरियाणा विधानसभा चुनावों में टिकट बंटवारे में दमड़ी के आरोप लगे। इसके अलावा टिकट वितरण में गंभीर खामियां उजागर हुईं, लेकिन अपमानजनक हार के बावजूद पार्टी हाईकमान को गैर-जवाबदेयता रास आती रही। अहंकारग्रस्त नेताओं द्वारा मुद्दों पर ध्यान न देना और पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं की अनदेखी बुरे नतीजों का कारण बनती है। हरियाणा में उम्मीदवार चयन के लिए जिम्मेदार जिन लोगों पर गंभीर आरोप लगे, उन्हीं को बिहार में भी उम्मीदवार चयन की जिम्मेदारी दी गई। नतीजा सामने है।

यह सोचना ही अटपटा लगता है कि सैकड़ों साल पुरानी पार्टी गलतियों से कोई सबक नहीं ले रही है। केवल निहित स्वार्थ और निजी पसंद के आधार पर राज्यसभा सीटों के भी फैसले लिए गए। कांग्रेस को अपनी दो राज्यसभा सीटें, एक राजस्थान में और दूसरी हरियाणा में गंवानी पड़ी। अगर तेलंगाना के मुख्यमंत्री सक्रिय नहीं हुए होते तो शायद राज्यसभा में विपक्ष के नेता के पद के भी लाले पड़ गए होते, लेकिन आखिर परवाह किसे है? पक्षपात और अपारदर्शिता आंतरिक लोकतंत्र के दुश्मन होते हैं। उदयपुर अधिवेशन में पारित एक व्यक्ति-एक पद और एक पद के लिए पांच वर्ष की अवधि वाले प्रस्ताव सबसे महत्वपूर्ण थे, किंतु इन प्रस्तावों की अवहेलना उन्हीं के द्वारा की जा रही है, जिन्होंने उन्हें पारित कराया। आखिर ऐसे लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे आत्ममंथन करेंगे?

शिक्षित और साफ सुथरी छवि वाले नए चेहरे, पार्टी एवं संगठन के प्रति समर्पित और गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रतिभावान लोगों को चुनाव में अवसर देने की बातें असल में बातें ही रह गईं। शीर्ष नेतृत्व द्वारा किए गए वादे खोखले और निरर्थक साबित हुए। हावी रहा तो वंशवाद और दमड़ी का प्रभाव। वोट चोरी की चर्चा के बीच पार्टी में सिद्धांतों से समझौते और कथनी एवं करनी के अंतर की चर्चा भी जोरों पर है। इसका एक उदाहरण है 2019 में गुरुग्राम विधानसभा में कांग्रेस का उम्मीदवार। उसके खिलाफ वोट चोरी के सिर्फ आरोप ही नहीं लगे, अपितु अपितु 18 एफआइआर भी दर्ज हुईं और उनका संज्ञान शीर्ष नेतृत्व ने लिया, लेकिन उसी को उम्मीदवार बनाया गया। अनेक राज्यों में युवा कांग्रेस के चुनावों में धांधली और प्रलोभन के आरोप लगते रहे। इन चुनावों में अमीर या बड़े नेताओं के प्रायोजित उम्मीदवारों की विजय होती रही, लेकिन नेतृत्व की आंखें बंद रहीं।

कुशल प्रबंधन का पहला नियम होता है, मेरिट को बढ़ावा देना, न कि उसकी अनदेखी करना। प्रतिभा की उपेक्षा ने कई समर्थ नेताओं को दूसरी पार्टियों की गोद में धकेलने का काम किया है। जिन्होंने वर्षों तक तन, मन, धन से योगदान दिया, उन्हें ‘लंगड़ा घोड़ा’ कहना या तो एक बहाना है या सही-गलत की पहचान करने से इन्कार करना। घोड़े को रेस का घोड़ा बनाने में प्रशिक्षक एवं घुड़सवार की योग्यता महत्वपूर्ण होती है। अगर कोई रेस के लिए उपयुक्त घोड़े के बजाय कमजोर घोड़े का चयन करे तो फिर प्रशिक्षक एवं घुड़सवार क्या कर पाएंगे? पंजाब और असम ऐसे राज्य हैं, जहां रेस से बाहर होने का श्रेय नेतृत्व को जाता है। किन ‘काबिल’ घोड़ों को चुना गया और किन ‘नाकाबिल’ घोड़ों को रेसिंग ट्रैक से बाहर धकेल दिया गया, यह जगजाहिर है। यदि बार-बार की हार भी सबक नहीं सिखा पा रही तो इसमें गलती कांग्रेस समर्थकों की नहीं।

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