Chitale Bandhu success story: 14 साल की उम्र में शुरू हुआ संघर्ष, आज 333 करोड़ का कारोबार
आज देश भर में 125 से अधिक स्टोर और 333 करोड़ रुपये के राजस्व के साथ चितले बंधु मिठाईवाले (Chitale Bandhu Mithaiwale) एक जाना-माना नाम है। लेकिन इस सफलता की कहानी की शुरुआत बेहद संघर्षपूर्ण रही। इसके संस्थापक भास्कर गणेश चितले, जिन्हें प्यार से बाबासाहेब कहा जाता था, ने महज 14 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था। जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद, उन्हें घर की जिम्मेदारी संभालने के लिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
1918 में स्पेनिश फ्लू जैसी महामारी ने उनके जीवन को और भी कठिन बना दिया। हालात इतने खराब हुए कि उन्हें सातारा जिले के लिंबगांव में खेतों में मजदूरी करनी पड़ी। जब मजदूरी से भी गुजारा नहीं हुआ, तो उन्होंने सांगली जिले के भिलवड़ी में नई शुरुआत करने का फैसला किया।
भिलवड़ी में भास्कर चितले ने डेयरी व्यवसाय शुरू किया, लेकिन किस्मत ने फिर परीक्षा ली। बीमारी के कारण मवेशी मरने लगे और उनका पहला व्यवसाय पूरी तरह ठप हो गया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और 1939 में चितले ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज की नींव रखी। उस दौर में दूध को स्टोर करना बड़ी चुनौती थी, इसलिए उन्होंने दही, श्रीखंड और चक्का जैसे उत्पादों पर ध्यान केंद्रित किया।
1950 में पुणे के कुंटे चौक पर पहली चितले बंधु दुकान खुली। 1976 में उन्होंने भाकरवड़ी को महाराष्ट्रीयन स्वाद में पेश किया, जो आज उनका सबसे प्रसिद्ध उत्पाद है। जहां पहले 40 लोग मिलकर 200 किलो भाकरवड़ी बनाते थे, वहीं अब आधुनिक मशीनों से एक घंटे में 2,000 किलो का उत्पादन होता है। आज चौथी पीढ़ी के उद्यमी इंद्रनील और केदार चितले इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
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