सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: CSR में पर्यावरण जिम्मेदारी को अलग नहीं किया जा सकता, Great Indian Bustard Indian Bustard पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) को कॉरपोरेट पर्यावरणीय जिम्मेदारी से अलग नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कंपनियां पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के अन्य जीवों की अनदेखी कर स्वयं को सामाजिक रूप से जिम्मेदार नहीं कह सकतीं। यह फैसला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चांदुरकर की पीठ ने पक्षियों की विलुप्तप्राय प्रजाति सोन चिरैया (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के संरक्षण के लिए दायर याचिका पर सुनाया।
कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51ए (जी) के तहत वन, झीलों, नदियों और वन्यजीवों समेत प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा एवं संवर्धन करना तथा सभी जीवों के प्रति करुणा रखना प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य है। पीठ ने स्पष्ट किया कि CSR निधि इस कर्तव्य की मूर्त अभिव्यक्ति है और पर्यावरण संरक्षण के लिए धन का आवंटन एक संवैधानिक दायित्व है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के तहत संसद ने इस कर्तव्य को संस्थागत रूप दिया है। यह प्रविधान इस सिद्धांत को संहिताबद्ध करता है कि कॉरपोरेट लाभ केवल शेयरधारकों की संपत्ति नहीं है, बल्कि समाज की भी है। पीठ ने निदेशकों के कर्तव्यों में विस्तार करते हुए कहा कि उन्हें कंपनी, कर्मचारियों, शेयरधारकों, समुदाय और पर्यावरण के सर्वोत्तम हित में कार्य करना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा सर्वोपरि दायित्व है और कॉरपोरेट कर्तव्य केवल शेयरधारकों की रक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह आदेश पर्यावरणविद् एमके रंजीत सिंह द्वारा 2019 में दायर याचिका पर सुनाया गया, जिसमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण के लिए कदम उठाने का अनुरोध किया गया था। यह प्रजाति राजस्थान और गुजरात में गैर-नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों के कारण संकट में है।
