बिहार चुनाव 2025: पार्टी सिंबल पर ही जीत, निर्दलीय एक भी नहीं जीते
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणाम ने एक नया राजनीतिक संदेश दिया है। इस बार के चुनाव में उन्हीं उम्मीदवारों को जीत मिली है, जिन्होंने किसी न किसी राजनीतिक दल के सिंबल पर चुनाव लड़ा था। बिना किसी दल के समर्थन के मैदान में उतरे एक भी निर्दलीय प्रत्याशी को इस बार सफलता नहीं मिली है। यह झारखंड के बंटवारे के बाद पिछले ढाई दशकों में पहला अवसर है, जब बिहार विधानसभा में कोई भी निर्दलीय विधायक नहीं पहुंचा है। यह लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की बढ़ती स्वीकार्यता और ताकत का स्पष्ट प्रमाण है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाताओं का रुझान अब संगठित राजनीतिक दलों की ओर बढ़ रहा है। सीमित संसाधनों और प्रचार तंत्र के अभाव में निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाना और उन्हें प्रभावित करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है।
निर्दलीय प्रत्याशियों की चुनावी पूछ में यह गिरावट कोई अचानक नहीं आई है, बल्कि यह पिछले ढाई दशकों से जारी एक सतत प्रक्रिया है। आंकड़ों पर गौर करें तो फरवरी, 2005 के विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता ने 17 निर्दलीय विधायकों को सदन भेजा था। इसके मात्र छह महीने बाद अक्टूबर, 2005 में हुए चुनाव में यह आंकड़ा घटकर 10 रह गया। इसके बाद 2010 के चुनाव में छह, 2015 के चुनाव में चार और 2020 के पिछले चुनाव में महज एक निर्दलीय उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर सका था। इस बार यह संख्या शून्य पर सिमट गई है, जो एक बड़ा बदलाव है।
एक रोचक संयोग यह भी रहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में चकाई सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल करने वाले सुमित कुमार सिंह इस बार जदयू के टिकट पर लड़े, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इस बार के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों को न केवल पहला स्थान नहीं मिला, बल्कि दूसरे स्थान पर भी महज चार निर्दलीय ही रह सके। इनमें कुशेश्वरस्थान से गणेश भारती, मोहनिया से रविशंकर पासवान, परिहार से रितु जायसवाल और सिकटा से खुर्शीद फिरोज अहमद शामिल हैं। हालांकि, इन सभी की हार का अंतर 17 हजार से 47 हजार मतों के बीच रहा, जो दर्शाता है कि जीत से इनकी दूरी काफी अधिक थी। पिछले विधानसभा चुनाव में दस निर्दलीय उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे, जिससे स्पष्ट है कि निर्दलीयों की स्वीकार्यता में लगातार कमी आ रही है।
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