भागवत कथा में आचार्य ने बताया, गुरु-मित्र से छल का मिलता है दंड, सुदामा का उदाहरण
मंगलपुर कस्बे में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कथावाचक आचार्य नवलेश महाराज ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए श्रोताओं को महत्वपूर्ण सीख दी। उन्होंने बताया कि भगवान का परम भक्त और निष्काम कर्मयोगी होने के बावजूद, सुदामा को बाल्यावस्था में अपनी गुरुमाता द्वारा दिए गए चनों को अपने मित्र श्रीकृष्ण से छिपाकर खाने के कारण दरिद्रता का सामना करना पड़ा।
आचार्य ने इस प्रसंग को समझाते हुए कहा कि सुदामा की भगवान श्रीकृष्ण के साथ मित्रता पूर्णतः नि:स्वार्थ थी, उन्होंने कभी भी उनसे किसी प्रकार के सुख-साधन या आर्थिक लाभ की कामना नहीं की। हालांकि, जब उनकी पत्नी के आग्रह पर वे द्वारिका गए, तो उनके द्वारा दिए गए तंदुल (चने) की पोटली ने उनकी दीन-हीन अवस्था को उजागर कर दिया। इसके प्रत्युत्तर में, भगवान श्री कृष्ण ने बिना मांगे ही सुदामा को अपार धन-संपदा प्रदान कर दी।
इस कथा के माध्यम से आचार्य ने गुरु और मित्र के प्रति छल न करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने श्रोताओं से श्रीकृष्ण और सुदामा की अटूट मित्रता से प्रेरणा लेने का संदेश दिया, जो किसी भी भौतिक लाभ से परे थी। इस अवसर पर जुग्गीलाल त्रिवेदी, कमलापति त्रिवेदी, प्रभाकांत त्रिवेदी, श्याम बाबू, प्रकाश नारायण, प्रेम बाबू, कमलेश, संजय कुमार, जयप्रकाश और राकेश कुमार सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। यह कथा सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों और संबंधों की पवित्रता को बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती है।
