मोदी का आह्वान: गुलामी की मानसिकता से मुक्ति राष्ट्रीय आवश्यकता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2035 तक मैकाले की शिक्षा-व्यवस्था से उपजी गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का आह्वान, एक सर्वथा उपयुक्त और गहन राष्ट्रीय आवश्यकता है। यह बात सूत्रों के हवाले से सामने आई है, जो भारतीय संस्कृति की उपेक्षा और विदेशी तौर-तरीकों को अपनाने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करती है।
विभाजनकारी वृत्तियों के साथ-साथ औपनिवेशिक मानसिकता “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के दृष्टिकोण में एक बड़ी बाधा रही है। जहां विभाजनकारी प्रवृत्तियों ने देश को कमजोर करने और बांटने का प्रयास किया, वहीं औपनिवेशिक मानसिकता ने भारत को उसकी शक्ति के मूल स्रोत से जुड़ने से रोका। अपनी जड़ों से जुड़े बिना न तो प्रगति संभव है और न ही मौलिक पहचान का निर्माण। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यह आशा थी कि भारत अपनी संस्कृति, विरासत और परंपराओं के अनुरूप अपनी राह प्रशस्त करेगा।
यह उम्मीद थी कि भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहकर शिक्षा, चिकित्सा, शोध, विज्ञान, अनुसंधान, सुशासन और विकास के आदर्श प्रतिमान गढ़ेगा। परंतु, दुर्भाग्यवश, सत्ता का हस्तांतरण तो हुआ, लेकिन सत्ता-व्यवस्था का चरित्र और स्वरूप नहीं बदला। भारत 1947 में स्वतंत्र तो हुआ, पर स्व पर आधारित तंत्र, मंत्र और मानस का निर्माण आज तक नहीं हो सका। इसके परिणामस्वरूप, शिक्षा से लेकर कला, साहित्य, सिनेमा, शासन-व्यवस्था, न्याय, वास्तु, विज्ञान और चिकित्सा तक, परकीय तंत्र, सोच और दृष्टि की प्रभावी भूमिका यथावत बनी हुई है।
सूत्रों के अनुसार, यह अनुभव किया गया है कि अपनी भाषा, वेश-भूषा और सांस्कृतिक प्रतीकों पर गौरव बोध रखने वाले भारतीयों को अपनी ही संस्थाओं द्वारा असमान व्यवहार, उपेक्षा या अपमान का सामना करना पड़ा है। केवल कॉर्पोरेट जगत में ही नहीं, बल्कि सरकारी संस्थाओं में भी ज्ञान और योग्यता का पैमाना कार्यकुशलता के बजाय अंग्रेजी भाषा की दक्षता को मान लिया गया है। मौलिकता और सहजता के अभ्यासी भारतीयों को ‘शिष्टाचार’ के नाम पर असहज, अ-मौलिक और अभारतीय बनाने का अभियान महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक चलाया जा रहा है।
मैकाले द्वारा प्रणीत शिक्षण-तंत्र ने श्रम, कौशल और प्रतिभा का अवमूल्यन करते हुए “सूट-बूट वाली कुलीन संस्कृति एवं आभिजात्यवादी मानसिकता” को बढ़ावा दिया है। पश्चिमीकरण को ही विकास और आधुनिकता का पर्याय मान लिया गया है। अपनी परंपराओं और त्योहारों के प्रति शंका उत्पन्न करना और पश्चिमी त्योहारों, परंपराओं व दिवसों को उत्सव की तरह प्रस्तुत व प्रोत्साहित करना भी औपनिवेशिक मानसिकता का ही एक उदाहरण है।
आज दुनिया योग, ध्यान और आसन आदि के सकारात्मक प्रभावों को स्वीकार करती है, लेकिन भारत ने इन्हें तब अपनाया जब पश्चिम ने इन्हें मान्यता दी। आयुर्वेद को समग्र चिकित्सा पद्धति होने के बावजूद, हम आज भी उसे वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अधिक महत्व देने को तैयार नहीं। हमारी काल-गणना, ग्रहों-नक्षत्रों और ऋतुओं की अवधारणाएं पश्चिम से अधिक युक्तिसंगत और वैज्ञानिक हैं, पर हम उन्हें केवल पूजा-पाठ और त्योहारों तक सीमित मानते हैं। हमारा प्राचीन नगर-नियोजन, वास्तुशास्त्र और सांस्कृतिक धरोहर पश्चिम से अधिक विकसित और समृद्ध रहा है, पर पश्चिम के अंधानुकरण ने हमें सरलीकरण और एकरूपता का शिकार बना दिया है।
