डीबीटी से 44 लाख करोड़ ट्रांसफर, 833 साल लगेंगे गिनने में
भारत की कल्याणकारी प्रणाली में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) ने एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया है, जिसने टेक्नोलॉजी का उपयोग करके व्यवस्था की खामियों और भ्रष्टाचार को कम किया है। दशकों से, सरकारी योजनाओं के माध्यम से बांटे जाने वाले धन का एक बड़ा हिस्सा बिचौलियों और प्रशासनिक लीकेज की भेंट चढ़ जाता था। अध्ययनों से पता चला है कि पहले वितरित किए गए प्रत्येक 100 रुपये में से केवल 15 रुपये ही वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचते थे।
इस गंभीर समस्या के समाधान के रूप में, सरकार ने 2013 में डीबीटी योजना की शुरुआत की। इस प्रणाली के माध्यम से, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) जैसी कई प्रमुख योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजा जाता है। पीएम-किसान योजना की हालिया किश्तें भी इसी डीबीटी के माध्यम से वितरित की गई हैं।
डीबीटी के माध्यम से अब तक कुल 44 लाख करोड़ रुपये की राशि हस्तांतरित की जा चुकी है। यदि इस विशाल राशि को प्रति मिनट एक लाख रुपये की दर से गिना जाए, तो इसे गिनने में लगभग 833 साल का समय लग जाएगा। यह आंकड़ा डीबीटी की पहुंच और प्रभाव को दर्शाता है।
डीबीटी का मूल सिद्धांत ‘डायरेक्ट बेनिफिशियरी’ यानी सीधे लाभार्थी को लाभ पहुंचाना है। एक समय था जब सरकारी योजनाओं का लाभ लाभार्थियों तक पहुंचते-पहुंचते काफी कम हो जाता था, जिसमें 85% तक राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती थी। यह कमी विशेष रूप से चिंताजनक थी क्योंकि भारत अपनी जीडीपी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सब्सिडी और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च करता है।
2014 में जन धन योजना की शुरुआत और मोबाइल कनेक्टिविटी में तीव्र वृद्धि ने डीबीटी प्रणाली के विस्तार के लिए एक मजबूत आधार प्रदान किया। इस डिजिटल क्रांति के केंद्र में आधार प्रणाली है, जिसने सत्यापन प्रक्रिया को सरल बनाया और डुप्लीकेट रिकॉर्ड को समाप्त करके यह सुनिश्चित किया कि सरकारी सहायता सही लोगों तक पहुंचे।
