बिहार चुनाव में NOTA का ‘खेल’: क्या बदला समीकरण, जानें पूरी रिपोर्ट
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, जिसमें एनडीए ने 202 सीटों के साथ शानदार जीत दर्ज की है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। लेकिन इन बड़ी जीतों के बीच, एक और पहलू पर ध्यान देना ज़रूरी है – नोटा।
चुनाव में नोटा को मिले वोटों की संख्या ने कई लोगों का ध्यान खींचा है। इस बार करीब नौ लाख मतदाताओं ने नोटा पर वोट डाला, जो कुल वोट शेयर का 1.81% है। यह मतदाताओं में व्याप्त असंतोष का एक स्पष्ट संकेत है।
सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद 2013 में नोटा विकल्प की शुरुआत हुई। कोर्ट ने चुनाव आयोग को ईवीएम और मतपत्रों में नोटा का बटन शामिल करने का निर्देश दिया, जिससे मतदाताओं को सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का अधिकार मिल सके।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2020 के चुनाव में नोटा को 1.7% वोट मिले थे, जबकि 2015 में यह आंकड़ा 2.5% था। इस बार यह 1.81% रहा।
अगर हम अन्य पार्टियों के प्रदर्शन पर नज़र डालें, तो असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM को 1.85% वोट मिले, जबकि नोटा को 1.81% वोट मिले। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (JSP), जिसने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा था, 68 निर्वाचन क्षेत्रों में नोटा से पीछे रही।
सूत्रों के अनुसार, कई ऐसे उम्मीदवार जो बदलाव के वादे के साथ मैदान में उतरे थे, उन्हें भी मतदाताओं ने प्राथमिकता नहीं दी। स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम मतदाताओं की निराशा और मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य से असंतोष को दर्शाता है।
नोटा के बढ़ते महत्व ने राजनीतिक दलों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह मतदाताओं की मांगों और अपेक्षाओं को समझने और उन पर खरा उतरने की आवश्यकता पर ज़ोर देता है।
नोटा की भूमिका आने वाले चुनावों में भी महत्वपूर्ण रहने की संभावना है। राजनीतिक दलों को अब मतदाताओं के इस बदलते रुख को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति बनानी होगी।
कुल मिलाकर, बिहार चुनाव में नोटा की भूमिका ने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया है और यह लोकतंत्र में मतदाताओं की बढ़ती जागरूकता का प्रतीक है।
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