दिल्ली उच्च न्यायालय ने सत्य निकेतन हादसे के बाद student safety को लेकर दिए कड़े निर्देश
दिल्ली में छात्रों के रहने के लिए बने प्राइवेट हॉस्टल और पीजी आवासों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सत्य निकेतन क्षेत्र में हुई दुर्घटना का संज्ञान लेते हुए नगर निगम को उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि क्या संबंधित इमारतें वैध मंजूरियों के साथ संचालित हो रही थीं।
आवास संकट और सुरक्षा का संकट
दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त हॉस्टल नहीं होने के कारण उन्हें असुरक्षित निजी आवासों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। आंकड़ों के मुताबिक, विश्वविद्यालय में सात लाख से अधिक छात्र पंजीकृत हैं, जबकि आधिकारिक हॉस्टलों में बमुश्किल सात से आठ हजार कमरे ही उपलब्ध हैं। स्थिति इतनी विकट है कि हर इकतालीस में से केवल एक छात्र को ही छात्रावास की सुविधा मिल पाती है, जिससे मजबूरन उन्हें बिना अनुमति के बनी बहुमंजिला इमारतों में शरण लेनी पड़ती है।
उच्च न्यायालय का कड़ा रुख
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि जिन इमारतों की नींव केवल दो मंजिलों के लिए होती है, वहां अवैध रूप से कई अतिरिक्त मंजिलें खड़ी कर दी जाती हैं। इस तरह के लापरवाह निर्माण कार्यों से छात्रों की जान को हमेशा खतरा बना रहता है। इस गंभीर जनहित के मुद्दे पर स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं, क्योंकि समय रहते निरीक्षण न होने से ऐसे हादसे आम हो चले हैं।
अदालत ने एमसीडी और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने क्षेत्र के सभी हॉस्टलों और पीजी का पूरी तरह से ऑडिट कर दस दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट दाखिल करें। इस सख्ती से उम्मीद की जा रही है कि छात्रों के जीवन से खिलवाड़ करने वाले अवैध निर्माणों पर रोक लगेगी और विद्यार्थियों को सुरक्षित आशियाना मिल सकेगा।
