दहेज हत्या के 30 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने सजा रद्द की, dowry case पर अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लगभग 30 साल पुराने एक दहेज हत्या के मामले में तीन आरोपियों की सजा को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि मृतका की मौत से ठीक पहले उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था। इस कारण, भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के तहत दहेज हत्या की धारणा लागू नहीं की जा सकती।
न्यायमूर्ति मनोज बजाज की एकल पीठ ने शिव नारायण उर्फ सूर्य नारायण, जय नारायण और पटेश्वर की अपील को स्वीकार करते हुए यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। यह मामला 1991 में हुई उर्मिला की मौत से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, उर्मिला 19/20 सितंबर 1991 की रात लापता हुई थी और उसका शव ससुराल के पास एक कुएं से बरामद हुआ था। आरोप था कि दहेज के लिए प्रताड़ित करने के बाद उसकी हत्या कर शव कुएं में फेंक दिया गया था।
कोर्ट ने पाया कि शव बरामद होने के समय मृतका के पिता और अन्य रिश्तेदारों ने डूबने की आशंका जताई थी, न कि हत्या या दहेज हत्या की। औपचारिक एफआईआर 12 दिन बाद दर्ज हुई, जिसकी देरी को भी पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया जा सका। कोर्ट ने यह भी देखा कि स्कूटर की दहेज मांग का आरोप एफआईआर या जांच के दौरान दर्ज बयानों में नहीं था, और यह पहली बार ट्रायल के दौरान सामने आया। मृतका ने अपने जीवनकाल में कभी भी दहेज उत्पीड़न की शिकायत नहीं की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-बी के तहत दहेज मृत्यु की धारणा तभी लागू होती है, जब मौत से ठीक पहले महिला को क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा हो।
इस फैसले का आम जनता पर यह प्रभाव पड़ेगा कि अदालतों में दहेज से जुड़े मामलों में सबूतों की बारीकी से जांच की जाएगी और केवल प्रताड़ना के आरोपों के आधार पर सजा नहीं सुनाई जाएगी।
