Raebareli News: होली के एक सप्ताह बाद मनाई गई ‘शोक होली’, जानें क्या है इतिहास?
रायबरेली जिले के जलालपुर धई और खजूरी गांवों में होली का त्योहार मुख्य तिथि के एक सप्ताह बाद मनाया जाता है। इस साल भी शुक्रवार को इन गांवों में होली मनाई गई, जहां लोगों ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर खुशियां बांटी। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसके तहत ग्रामीण होली के दिन शोक मनाते हैं और सातवें दिन के बाद आने वाले पहले सोमवार या शुक्रवार को त्योहार मनाते हैं।
जलालपुर धई की ऐतिहासिक कहानी
जलालपुर धई गांव के लोग बताते हैं कि यह कभी एक रियासत थी, जिस पर राजा धईसेन का शासन था। मुगल शासक सैयद जमालुद्दीन की नजर इस रियासत पर थी। उसे पता चला कि राजा धईसेन होली के दिन अपनी प्रजा के साथ होली खेलते हैं और इस दौरान कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं रखते। जमालुद्दीन ने इसी बात का फायदा उठाकर होली के दिन राजा धईसेन और उनकी निहत्थी प्रजा पर हमला कर दिया। इस हमले में राजा धईसेन वीरगति को प्राप्त हुए और कई लोग मारे गए।
शोक से शुरू हुई नई परंपरा
इस घटना के बाद, जलालपुर धई गांव में होली के दिन शोक का माहौल रहने लगा। कहा जाता है कि राजा धईसेन ने स्वप्न में गांव की प्रजा को बताया कि होली के सातवें दिन के बाद आने वाले सोमवार या शुक्रवार को वे होली मनाएं। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। इस साल भी पूर्व प्रधान मुनेश्वर सिंह और वर्तमान प्रधान ऋषि प्रसाद के नेतृत्व में गांव में पकवान बने और होली खेली गई।
खजूरी गांव में भी अनोखी परंपरा
गदागंज क्षेत्र के खजूरी खजूरी गांव में भी होली के दिन शोक मनाया जाता है। गांव के लोगों का कहना है कि पुराने समय में मुगल शासकों ने होली के दिन खजूरी गांव के किले को ध्वस्त कर दिया था। इस घटना में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी। होली के दिन खून की होली होने के कारण तब से गांव वासी होली के दिन शोक मनाते हैं और त्योहार को एक सप्ताह बाद मनाते हैं।
