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शाहजहांपुर का अनोखा ‘लाट साहब’ जुलूस: 300 साल से होली पर बरसते हैं जूते-चप्पल, जानें पूरा इतिहास

By Mar 3, 2026

शाहजहांपुर में होली के रंग के साथ-साथ एक अनोखी परंपरा का जश्न मनाया जाता है – ‘लाट साहब’ का 300 साल पुराना जुलूस। इस जुलूस की खासियत यह है कि इसमें ‘लाट साहब’ पर रंग के साथ-साथ जूते-चप्पल भी बरसाए जाते हैं, जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ तत्कालीन जनमानस के गुस्से का प्रतीक था। यह परंपरा आज भी उसी जोश और उल्लास के साथ जारी है, लेकिन इसके साथ ही भीड़भाड़ और संभावित हुड़दंग से निपटने के लिए पुलिस प्रशासन को हर साल नई रणनीति बनानी पड़ती है।

इस अनूठे जुलूस का इतिहास अवध क्षेत्र के नवाबों से जुड़ा है, जो खुलकर लोगों के साथ होली खेलते थे और नगर भ्रमण करते थे। स्थानीय इतिहास के अनुसार, 1728 में नवाब अब्दुल्ला खान के वापस लौटने पर होली खेली गई और शहर का चक्कर लगाया गया। 1857 की क्रांति के बाद इस जुलूस का स्वरूप और विस्तृत हुआ और ब्रिटिश गवर्नर के प्रतीक के रूप में ‘लाट साहब’ की एंट्री हुई। तब से, लोग जूते-चप्पल और जूतों की माला पहनाकर अंग्रेजी शासन के प्रति अपना विरोध दर्ज कराते आए हैं। वर्ष 1988 में तत्कालीन डीएम कपिल देव की सलाह पर इसका नाम ‘लाट साहब का जुलूस’ कर दिया गया।

‘लाट साहब’ का जुलूस सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के प्रशिक्षण का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रशिक्षु अधिकारियों को इस जुलूस के प्रशासन और प्रबंधन के बारे में सिखाया जाता है, क्योंकि यह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिहाज से एक संवेदनशील परीक्षा होती है।

जुलूस के दौरान, ‘लाट साहब’ शहर कोतवाली पहुंचते हैं, जहां उन्हें सलामी दी जाती है और कोतवाल से अपराध रिकॉर्ड मांगे जाते हैं। इसके बाद जुलूस विभिन्न मार्गों से होते हुए बाबा विश्वनाथ मंदिर पहुंचता है, जहां देव प्रतिमाओं के सामने माथा टेकने के बाद यह समाप्त होता है। इस आयोजन की संवेदनशीलता को देखते हुए, सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं, जिसमें ट्रैफिक डायवर्जन, मार्ग बंद करना और अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती शामिल है। कुछ धार्मिक स्थलों को तिरपालों से ढक दिया जाता है और गलियों में बैरिकेडिंग की जाती है, ताकि जुलूस शांतिपूर्वक संपन्न हो सके।

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