यूपी में स्कूल बंदी और फीस वृद्धि पर फूटा गुस्सा, SFI conference में उठे गंभीर सवाल
लखनऊ के हुसैनाबाद स्थित नेहरू युवा केंद्र में स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) का 17वां उत्तर प्रदेश राज्य सम्मेलन शुरू हुआ। इस दो दिवसीय सम्मेलन में राज्य भर से आए छात्र प्रतिनिधियों ने शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं पर गहन चर्चा की। सम्मेलन का उद्घाटन प्रोफेसर सूरज बहादुर थापा ने किया, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर हो रहे स्कूल बंद होने पर चिंता व्यक्त की।
प्रोफेसर थापा ने बताया कि सरकार का तर्क है कि 27,000 स्कूलों को इसलिए बंद किया जाना चाहिए क्योंकि उनमें छात्र नहीं हैं, जबकि वास्तविक कारण सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे और फैकल्टी की कमी है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों जैसे बीएलओ और जनगणना ड्यूटी में लगाया जाता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने एक ऐसे स्कूल का उदाहरण दिया जो बंद होने की कगार पर था, जिससे कमजोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही थी।
SFI की अखिल भारतीय संयुक्त सचिव ऐशे घोष ने छात्र ड्रॉपआउट दरों की भयावह वास्तविकता को सामने रखा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) को ऐसे समय में लागू किया जब देश कोरोना महामारी के बीच में था। छात्रों को महीनों तक घर पर बैठना पड़ा, और सरकार ने इस अवसर का उपयोग बिना किसी बड़े छात्र आंदोलन के नीति को थोपने के लिए किया। उन्होंने कहा कि जब हमें अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था, सरकार ने शिक्षा नीति को प्राथमिकता दी।
सम्मेलन में मुजफ्फरनगर के डीएवी कॉलेज के छात्र स्वर्गीय उज्जवल राणा के चाचा सचिन राणा भी शामिल हुए। उन्होंने बताया कि फीस बकाया होने के कारण प्रबंधन ने उज्जवल को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी थी, जिसके बाद उसने आत्मदाह कर लिया। उज्जवल राणा छात्रों को सुलभ शिक्षा की मांग के लिए एकजुट कर रहे थे, जिसके लिए उन्हें प्रधानाचार्य, स्टाफ और पुलिस द्वारा परेशान किया गया था। यह घटना फीस वृद्धि के कारण छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को उजागर करती है।
