डिजिटल क्रांति में हिंदी की बढ़ती हिस्सेदारी: संचार क्रांति ने खत्म की दूरी, विचार लांघते हैं सीमाएं
लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर ‘हिंदी का प्रवासी: प्रवासी की हिंदी’ विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में वक्ताओं ने डिजिटल क्रांति में हिंदी की बढ़ती हिस्सेदारी और संचार क्रांति के प्रभाव पर गहन चर्चा की।
डिजिटल युग और हिंदी का भविष्य
संगोष्ठी में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि संचार क्रांति ने भौगोलिक दूरियों को लगभग समाप्त कर दिया है। विचारों का आदान-प्रदान अब पलक झपकते ही सीमाओं को लांघ जाता है, जिससे हिंदी जैसी भाषाओं को वैश्विक मंच मिला है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सस्ते डेटा की उपलब्धता ने भारत में हिंदी भाषी उपयोगकर्ताओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि की है। यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्मों पर हिंदी सामग्री की उपस्थिति लगातार बढ़ रही है, जो मनोरंजन से लेकर शिक्षा और समाचार तक फैली हुई है।
चुनौतियां और संवेदनाएं
हालांकि, इस डिजिटल प्रगति के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा दी जाने वाली गलत जानकारियों पर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने युवाओं को सही सूचना स्रोतों के प्रति सजग रहने की सलाह दी। यह भी रेखांकित किया गया कि डिजिटल क्रांति के दौर में संवेदनाओं का क्षरण एक गंभीर चिंता का विषय है। परंपरा और प्रगति के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। चीन के ग्वांगझू विश्वविद्यालय के पूर्व विजिटिंग प्रोफेसर गंगा प्रसाद शर्मा गुणशेखर ने पीढ़ी के अंतर के कारण डिजिटल ज्ञान में कमी की ओर इशारा किया।
वैश्वीकरण और हिंदी
यह भी माना गया कि वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेजी का प्रभुत्व है और कई सॉफ्टवेयर व ऐप अभी भी अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। हालांकि, ज्ञान की तकनीक ने हिंदी को वैश्विक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगोष्ठी का उद्देश्य युवाओं को डिजिटल हिंदी संचार माध्यमों के भविष्य और उसकी चुनौतियों से अवगत कराना था।
