टेस्ट क्रिकेट पर ‘बैजबॉल’ का खतरा: मैक्कलम और गंभीर की सोच से हो रहा नुकसान
टेस्ट क्रिकेट को बचाने के लिए आईसीसी द्वारा डे-नाइट टेस्ट और टेस्ट चैंपियनशिप जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि, टीमों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे टेस्ट क्रिकेट की शैली को बनाए रखें और इसके मूल सिद्धांतों से समझौता न करें। लेकिन इंग्लैंड के कोच ब्रेंडन मैक्कलम और भारत के कोच गौतम गंभीर की हालिया सोच ने टेस्ट क्रिकेट को काफी नुकसान पहुंचाया है।
ब्रेंडन मैक्कलम के इंग्लैंड के कोच बनने के बाद ‘बैजबॉल’ का चलन शुरू हुआ, जिसमें आक्रामक खेल पर जोर दिया गया। वहीं, 2024 में भारत के कोच बनने के बाद गौतम गंभीर की देखरेख में टीम इंडिया का टेस्ट में प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। घरेलू मैदान पर भी टीम को हार का सामना करना पड़ा है।
गंभीर और मैक्कलम की सोच में अति आक्रामकता हावी है। गंभीर ने पारंपरिक टेस्ट शैली में बदलाव करते हुए विशेषज्ञ खिलाड़ियों की जगह ऑलराउंडरों को तरजीह दी, जिसका भारत को नुकसान हुआ। इंग्लैंड की टीम ‘बैजबॉल’ अपनाने के बाद से टेस्ट में लगातार गिरती रही है और टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल की दौड़ से बाहर रही है।
टेस्ट क्रिकेट में आक्रामकता होनी चाहिए, लेकिन यह हर खिलाड़ी की शैली नहीं हो सकती। टेस्ट क्रिकेट के लिए पांच दिन खेलने वाले विशेषज्ञ खिलाड़ी चाहिए होते हैं, जो सेशन दर सेशन अपनी पकड़ मजबूत कर सकें। इंग्लैंड में भी ‘बैजबॉल’ के कारण जो रूट जैसे बल्लेबाज को अपनी शैली बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे उनका प्रदर्शन प्रभावित हुआ।
गंभीर ने भी विशेषज्ञ खिलाड़ियों को नजरअंदाज कर ऑलराउंडरों को प्राथमिकता दी, जैसे वॉशिंगटन सुंदर को मौका देना और कुलदीप यादव को नजरअंदाज करना। सरफराज खान और ऋतुराज गायकवाड़ जैसे शुद्ध टेस्ट बल्लेबाजों को भी टीम से बाहर रखा गया। गेंदबाजी में भी मोहम्मद शमी को नजरअंदाज कर हर्षित राणा को प्राथमिकता दी गई।
ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका की टीमें टेस्ट के विशेषज्ञ खिलाड़ियों को जगह देने और उन्हें बचाने का बेहतरीन उदाहरण हैं। इसी का नतीजा है कि ऑस्ट्रेलिया ने 2023 और दक्षिण अफ्रीका ने 2025 में टेस्ट चैंपियनशिप जीती। दक्षिण अफ्रीका ने तो भारत को उसी के घर में हराया। टी20 शैली ने वेस्टइंडीज जैसे देशों के पास टेस्ट खिलाड़ी ही नहीं छोड़े हैं, जो उनकी वर्तमान स्थिति का उदाहरण है।
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