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इलाज के भारी-भरकम खर्च पर लगेगी लगाम, भागलपुर की प्रोफेसर ने विकसित की नई तकनीक

By Dec 15, 2025

बीमारी अचानक नहीं आती, और जब आती है तो परिवार का दर्द डॉक्टर से पहले जेब महसूस करती है। इलाज का बिल कई बार इतना भारी पड़ता है कि घर-परिवार की आर्थिक नींव हिल जाती है। हर साल कई परिवार इसी अदृश्य संकट से गुजरते हैं, लेकिन आंकड़ों की मोटी परत के नीचे उनकी पीड़ा दबकर रह जाती है।

अब तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका डॉ. प्रत्याशा त्रिपाठी ने इसी छिपी त्रासदी को उजागर करने का नया रास्ता दिखाया है। उन्होंने ऐसी आउट्लायर डिटेक्शन तकनीक विकसित की है, जो आय के मुकाबले अचानक बढ़े इलाज के खर्च यानी कैटेस्ट्रॉफिक हेल्थ एक्सपेंडिचर, की बेहद सटीक पहचान कर सकती है।

यह शोध सिर्फ अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आम परिवारों की आर्थिक सुरक्षा से जुड़े सवाल का वैज्ञानिक समाधान है। स्वास्थ्य तंत्र अब भी आउट-ऑफ-पॉकेट पेमेंट पर टिका है। यही वजह है कि अस्पताल का एक बड़ा बिल घरों को कर्ज, तनाव और अक्सर गरीबी में धकेल देता है।

अध्ययन से पता चलता है कि लगभग 49 प्रतिशत भारतीय परिवारों ने अस्पताल या ओपीडी सेवाओं के दौरान ऐसे खर्च झेले जो उनकी आय के मुकाबले असहनीय होते हैं। 15 प्रतिशत परिवार इलाज के कारण गरीबी रेखा के नीचे पहुंच जाते हैं। बुजुर्गों वाले घरों में स्वास्थ्य खर्च घरेलू बजट को 17 से 24 प्रतिशत तक प्रभावित करता है। 4 वर्ष के बच्चों का निजी अस्पताल में भर्ती होना तो कई परिवारों के लिए सीधी आर्थिक आफत बन जाती है।

यहीं डॉ. त्रिपाठी का मॉडल तस्वीर बदलता है। पारंपरिक सांख्यिकीय तकनीकें अक्सर भारी-टेल्ड डेटा में असामान्य खर्चों को पहचानने में चूक जाती हैं, जिसके चलते संकटग्रस्त परिवार सामान्य आंकड़ों में गुम हो जाते हैं। नीतियां उन्हीं तक नहीं पहुंच पातीं, जिन्हें सबसे ज्यादा मदद की जरूरत होती है। लेकिन नई तकनीक छोटे सैंपल पर भी सटीक परिणाम देती है।

बड़े डेटा सेट में इसकी सटीकता 95 से 99 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। 10 हजार से अधिक सिमुलेशन इसकी मजबूती साबित करते हैं। पहली बार यह संभव होगा कि स्वास्थ्य योजनाएं उन घरों तक पहुंच सकें, जो इलाज के खर्च से सचमुच टूटते हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाते।

इसका सीधा और ठोस फायदा आम लोगों तक जाएगा। सरकार की आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के प्रभाव को अधिक सटीकता से माप सकेगी। कमजोर वर्गों तक समय पर आर्थिक सहायता, बेहतर बीमा कवरेज और स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक जरूरत का वैज्ञानिक आकलन संभव होगा।

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