‘हिंदी बचेगी तभी उर्दू बचेगी’, गुलाम नबी आजाद ने भाषाओं को धर्म से ऊपर बताया
पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा कि धर्म एक-दूसरे को उतना नजदीक नहीं लाते, जितना जुबान लाती है। हमें उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं को बचाने के लिए मुहिम शुरू करना होगी। हिंदी जिंदा रहेगी तभी उर्दू जिंदा रहेगी। वह रविवार को एरा विश्वविद्यालय में पांचवीं अंतरराष्ट्रीय उर्दू कांफ्रेंस में बोल रहे थे।
गुलाम नबी आजाद ने कहा कि आजादी के बाद जितने भी मुख्यमंत्री रहे, उनमें हेमवती नंदन बहुगुणा जोशी सबसे ज्यादा उर्दू का जौक और शौक रखते थे। उस जमाने में किसी से पूछो तुम्हारे नेता का क्या नाम है तो वह बहुगुणाजी का नाम बताता। बहुगुणाजी जैसे कम लोग होते हैं जो राजनीति करें और सबसे एक समान व्यवहार करें। उन्होंने कहा कि उर्दू को लगभग आठ-नौ राज्यों में दूसरी भाषा का दर्जा है, लेकिन केवल वोट वाला। अगर उर्दू शिक्षकों की व्यवस्था की जाए तो एक ही दिन में लाखों छात्र मिल जाएंगे।
नबी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विदेश में अपनी भाषा में बोलने के लिए बधाई देते हुए कहा कि इससे हमारी प्रतिष्ठा कम नहीं हुई है। अभी वक्त है उर्दू को बचाने का। उर्दू-हिंदी को बचाने और बढ़ाने के लिए उर्दू की शिक्षा की व्यवस्था होना चाहिए। उसके लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों और शिक्षा मंत्रियों से मुलाकात करें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व सांसद डा. रीता बहुगुणा जोशी ने की। कांफ्रेंस के अध्यक्ष पूर्व मंत्री डा. अम्मार रिजवी, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अब्बास अली मेहदी, अटल बिहारी वाजपेई चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव मिश्रा, पूर्व विधायक खान मोहम्मद आतिफ ने भी विचार साझा किए।
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