उत्तराखंड में शिक्षकों का बड़ा संकट: B.Ed की उपयोगिता सीमित, D.El.Ed की सीटें खाली… कैसे भरेगी कमी?
उत्तराखंड में शिक्षा विभाग इस समय शिक्षक व्यवस्था के गंभीर असंतुलन से जूझ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद प्राथमिक शिक्षक भर्ती में D.El.Ed को अनिवार्य किए जाने से इसकी मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है, लेकिन सीटों की संख्या बेहद सीमित है। दूसरी ओर, B.Ed कॉलेजों में हजारों सीटें खाली रह रही हैं। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि D.El.Ed की मात्र 650 सीटों के लिए 44 हजार से अधिक दावेदार मैदान में हैं।
देहरादून से मिली जानकारी के अनुसार, शिक्षा विभाग में शिक्षक व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार बेसिक शिक्षा भर्ती नियमों में हुए परिवर्तन ने प्राथमिक शिक्षक भर्ती में D.El.Ed को अनिवार्य कर दिया है। अब अभ्यर्थी बेसब्री से D.El.Ed सीटों में बढ़ोतरी की उम्मीद पाले हुए हैं, ताकि वे प्राथमिक शिक्षक बनने का अपना सपना पूरा कर सकें।
शिक्षाविदों का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए राज्य को त्वरित और व्यावहारिक निर्णय लेने होंगे। यदि D.El.Ed की सीटें तत्काल नहीं बढ़ाई गईं, तो भविष्य में प्राथमिक शिक्षकों की भारी कमी उत्पन्न हो सकती है, जिससे राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता और भर्ती संतुलन को ध्यान में रखते हुए शीघ्र और निर्णायक फैसले लेना अनिवार्य है।
राज्य के 110 B.Ed कॉलेजों में लगभग 6400 सीटें उपलब्ध हैं, जिनमें से पिछले चार वर्षों से लगभग 30 से 35 प्रतिशत सीटें रिक्त रह रही हैं। यह गिरावट साफ तौर पर दर्शाती है कि बदलते नियमों के बाद B.Ed की मांग में तेजी से कमी आई है। अब B.Ed केवल वही छात्र कर रहे हैं, जो बेसिक शिक्षक से ऊपर के पदों के लिए आवेदन करना चाहते हैं।
दूसरी तरफ, D.El.Ed के लिए स्थिति बिल्कुल उलट है। राज्य के 13 डायटों (DIETs) में प्रत्येक डायट में 50 सीटें हैं, जिससे कुल 650 सीटें ही उपलब्ध हैं। इन सीमित 650 सीटों के लिए इस वर्ष 44 हजार से अधिक अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी है। सीटों के मुकाबले यह भारी मांग बताती है कि D.El.Ed की उपलब्धता अत्यंत कम है, जिसे तत्काल बढ़ाए जाने की सख्त आवश्यकता है।
