उत्तराखंड में भालुओं का आतंक: चार साल पहले भी शीतनिंद्रा भूलकर किए थे हमले
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भालुओं का आतंक एक बार फिर देखने को मिल रहा है। इस समय जब भालुओं को शीतनिंद्रा पर होना चाहिए, वे आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास मंडरा रहे हैं और इंसानों पर हमला कर रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि चार साल पहले वर्ष 2020 और 2021 में भी भालुओं ने इसी तरह शीतनिंद्रा तोड़कर नवंबर और दिसंबर माह में ग्रामीणों पर हमले किए थे, जिससे लोग भयभीत थे।
वर्तमान में मानव-वन्यजीव संघर्ष का एक प्रमुख कारण भालू बन गए हैं। विशेष रूप से उत्तरकाशी जनपद में, भालुओं के हमलों की 13 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें भटवाड़ी विकासखंड के गांवों में दो महिलाओं की दुखद मौत भी शामिल है। जिस तरह भालू इन दिनों आक्रामक हैं, ठीक उसी तरह चार साल पहले भी वे शीतनिंद्रा पर जाने की बजाय हमलावर थे।
उत्तरकाशी वन प्रभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में भालुओं के 6 हमले हुए, जिनमें से पांच अक्टूबर और नवंबर माह में दर्ज किए गए थे। वहीं, 2021 में भी 6 घटनाएं हुईं, जिनमें से दो नवंबर और तीन दिसंबर माह में थीं। तब भी वन विभाग के अधिकारी भालुओं के शीतकाल में आक्रामक होने से हैरान थे। हालांकि, भालुओं के स्वभाव में इस तरह के बदलाव के कारणों पर कोई व्यापक अध्ययन नहीं हो पाया था, तब भी वन विभाग ने भारतीय वन्यजीव संस्थान से इस पर अध्ययन कराने की बात कही थी।
कुल मिलाकर, उत्तरकाशी वन प्रभाग में वर्ष 2020 से अब तक भालुओं के हमलों की 32 घटनाएं हुई हैं, जिनमें तीन लोगों की जान जा चुकी है। वर्षवार देखें तो 2020 में 6, 2021 में 6, 2022 में 5 (1 मौत सहित), 2023 में 1, 2024 में अब तक 4 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें दो मौतें शामिल हैं।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के एक वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. एस. सत्याकुमार के अनुसार, भालुओं के शीतनिंद्रा पर जाने के लिए जंगल में पर्याप्त भोजन, ठंड और बर्फबारी का होना आवश्यक है। लेकिन जंगलों में फल-फूलों की कमी और जलवायु परिवर्तन के कारण ठंड व बर्फबारी में देरी से भालू भोजन की तलाश में आवासीय बस्तियों का रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें कूड़ेदान आदि में आसानी से खाना मिल जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर भालू का शीतनिंद्रा पर जाना अनिवार्य नहीं होता।
डॉ. सत्याकुमार ने आगे बताया कि पूरे पश्चिम हिमालय क्षेत्र में पिछले दस वर्षों से भालुओं को दिसंबर माह में भी घूमते देखा जा रहा है, जबकि 50 साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में गर्माहट और बर्फबारी में देरी के कारण भालुओं के व्यवहार में यह बदलाव आया है। जैसे ही बर्फबारी से ठंड बढ़ेगी, उम्मीद है कि भालू शीतनिंद्रा पर चले जाएंगे।
