जातिगत मंशा जरूरी, SC-ST एक्ट तभी लागू: राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मामलों के अभियोजन में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। जस्टिस फरजद अली की एकल पीठ ने कहा है कि केवल अनुसूचित जाति या जनजाति का होने मात्र से किसी व्यक्ति के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो जातीं। अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए यह अनिवार्य है कि अपराध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत ऐसे अपराध की श्रेणी में आता हो, जिसमें 10 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपराध पीड़ित की जाति या जनजाति के कारण, यानी जातीय विद्वेष की मंशा से किया गया हो।
यह अहम फैसला प्रतापगढ़ जिले के एक 30 साल पुराने मामले की सुनवाई के दौरान आया। इस मामले में तीन भाइयों कालू, रुस्तम और वाहिद खान को निचली अदालत ने एससी-एसटी एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। उन्होंने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अभियुक्तों ने परिवादी की जमीन पर अतिक्रमण किया और उसके साथ मारपीट की।
हाईकोर्ट ने मामले की बारीकी से जांच की और पाया कि जमीन पर अतिक्रमण का विवाद वास्तव में एक पगडंडी (रास्ते) को लेकर था, न कि परिवादी की जाति के प्रति किसी द्वेषपूर्ण भावना से प्रेरित था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अतिक्रमण से संबंधित आईपीसी की धारा 447 के तहत अधिकतम सजा केवल तीन महीने है। इस आधार पर, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि एससी-एसटी एक्ट की धाराएं इस मामले में लागू नहीं हो सकतीं, क्योंकि अपराध के लिए निर्धारित न्यूनतम सजा 10 साल से काफी कम है और सबसे बढ़कर, अपराध के पीछे कोई जातिगत मंशा साबित नहीं हुई।
अदालत ने तीनों भाइयों को एससी-एसटी एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, अतिक्रमण के आरोप में उन्हें दोषी ठहराया गया। सजा के बिंदु पर, कोर्ट ने स्वीकार किया कि अपीलार्थी अब काफी वृद्ध हो चुके हैं और मामले को 30 साल से अधिक का समय बीत चुका है। जेल में बिताए गए समय को ही पर्याप्त सजा मानते हुए, हाईकोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन अतिरिक्त सजा से मुक्त कर दिया।
यह फैसला एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह स्पष्ट करता है कि इस कानून का उद्देश्य उन लोगों को सुरक्षा प्रदान करना है जिन्हें उनकी जाति के कारण व्यवस्थित उत्पीड़न या अत्याचार का सामना करना पड़ता है, न कि सामान्य आपराधिक विवादों को जातिगत रंग देना।
