40 साल बाद हाई कोर्ट ने लिया संज्ञान, तत्कालीन एसपी के ‘गुंडा’ व्यवहार पर मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत गंभीर मामले में लगभग 40 साल बाद स्वतः संज्ञान लिया है। यह मामला तब का है जब ललितपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश को भरी अदालत में धमकी दी थी।
वृंदावन व अन्य की अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने इस बात पर गहरा संज्ञान लिया। खंडपीठ ने पाया कि सेशन जज ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया था कि तत्कालीन एसपी ने उन्हें न केवल धमकाया, बल्कि थाने तक घसीट ले जाने की भी चेतावनी दी थी।
न्यायालय ने इस आचरण को अत्यंत निंदनीय बताते हुए कहा कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने एक ‘गुंडे की तरह व्यवहार’ किया। इस घटना के इतने वर्ष बीत जाने के बाद, न्यायालय ने तत्कालीन एसपी बीके भोला की वर्तमान स्थिति के बारे में अनिश्चितता व्यक्त की। यह स्पष्ट नहीं है कि वे अब भी जीवित हैं या नहीं, और यदि जीवित हैं तो क्या वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं या अभी भी सेवा में हैं।
इस अनिश्चितता को दूर करने के लिए, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को नौ दिसंबर तक एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में डीजीपी को यह बताना होगा कि क्या बीके भोला वर्तमान में जीवित हैं, और यदि हाँ, तो उनकी सेवा की स्थिति (सेवानिवृत्त या सेवारत) और उनके निवास का पूरा पता और थाना क्षेत्र की जानकारी देनी होगी।
इसके अतिरिक्त, डीजीपी को यह भी स्पष्ट करना होगा कि 1988 के उस फैसले में ट्रायल जज द्वारा दिए गए निर्देशों के आलोक में बीके भोला के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई थी। यह आदेश न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायाधीशों की सुरक्षा के प्रति न्यायालय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, भले ही घटना दशकों पूर्व हुई हो।
