मेरठ का ‘बिगुल’ अब विश्व पटल पर, जीआई टैग से ब्रांड को मिली अंतर्राष्ट्रीय पहचान
मेरठ का ‘बिगुल’ अब केवल स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाएगा। एक महत्वपूर्ण प्राधिकरण द्वारा इसे ब्रांड के रूप में स्वीकृति मिलने के बाद, इस वाद्य यंत्र को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त हुआ है, जिससे इसका वैश्विक बाजार में स्थान और मजबूत होगा। यह मेरठ के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की क्षमता रखती है।
जली कोठी स्थित जवाहर मार्केट में मेरठ वाद्य यंत्र निर्माता व विक्रेता व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक विशेष समारोह में इस उपलब्धि का जश्न मनाया गया। इस अवसर पर जिलाधिकारी डॉ. वीके सिंह को सम्मानित किया गया। जिलाधिकारी ने कहा कि जीआई टैग मिलने से बिगुल का अव्यवस्थित व्यापार अब व्यवस्थित होगा और केवल अधिकृत व्यक्ति ही इसके निर्माण और व्यापार से जुड़ सकेंगे। इससे नकली उत्पादों की समस्या समाप्त होगी और मेरठ की वाद्य यंत्र निर्माण की सदियों पुरानी परंपरा को एक नई पहचान मिलेगी।
उन्होंने आगे कहा कि मेरठ वाद्य यंत्रों के निर्माण के लिए पूरे देश और विदेश में प्रसिद्ध है। प्रशासन अब यहां के अन्य वाद्य यंत्रों को भी जीआई टैग दिलाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करेगा। इस उद्योग के विकास के लिए प्रशासन हरसंभव मदद का आश्वासन भी दिया गया।
समारोह में व्यापारियों ने बैंड उद्योग के लिए एक क्लस्टर स्थापित करने और जमीन उपलब्ध कराने की मांग भी जिलाधिकारी से की। साथ ही, इस उद्योग को ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना में शामिल करने का आग्रह भी किया गया। संगठन के अध्यक्ष मोहित चोपड़ा और महासचिव हाजी रहमतुल्लाह ने इस दिशा में प्रशासन से सहयोग की अपेक्षा व्यक्त की।
आंकड़ों के अनुसार, मेरठ में 500 से अधिक लघु इकाइयों में वाद्य यंत्रों का निर्माण होता है, जिनका सालाना कारोबार 150 करोड़ रुपये से अधिक है। इसमें अकेले बिगुल का कारोबार 80 करोड़ रुपये का है। एक बिगुल की कीमत 500 रुपये से शुरू होकर 6000 रुपये तक जाती है। स्काउट गाइड, पुलिस, सेना के बैंड और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों में इसकी विशेष मांग रहती है। जीआई टैग मिलने से इस प्रतिष्ठित उद्योग को न केवल प्रामाणिकता मिलेगी, बल्कि इसके निर्यात में भी वृद्धि की उम्मीद है।
