केरल ने सराही पंजाब की नई कृषि नीति, लागू करने की उठी पुरजोर मांग
पंजाब राज्य किसान एवं खेत मजदूर आयोग के अध्यक्ष प्रो. सुखपाल सिंह द्वारा केरल के कोझिकोड़ में प्रस्तुत की गई पंजाब की प्रस्तावित राज्य कृषि नीति को वहां की प्रमुख हस्तियों ने हाथों-हाथ लिया है। टाउन हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति चमलेश्वरम, प्रो. एम.एन. करासेरी, विधायक के.के. रेमा और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में इस नीति का विस्तृत प्रस्तुतिकरण किया गया।
प्रो. सुखपाल सिंह ने अपने संबोधन में पंजाब के गंभीर कृषि संकट पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि गेहूं-धान की एकफसली खेती के कारण 113 ब्लॉक अत्यधिक दोहन की श्रेणी में आ चुके हैं, जिससे भूजल का सालाना घाटा 13.27 अरब घन मीटर तक पहुंच गया है। खाद का उपयोग भी राष्ट्रीय औसत से दोगुना हो गया है। 60-90% किसान कर्ज में डूबे हुए हैं और आत्महत्या के अधिकांश मामले कर्ज से जुड़े हैं, न कि प्रचारित कारणों से।
नीति के तहत, सबसे ज्यादा संकटग्रस्त 15 ब्लॉकों में लंबी अवधि वाले धान की फसल पर चरणबद्ध प्रतिबंध लगाने और मुआवजे के साथ मक्का, कपास, गन्ना, सब्जियां व बागवानी जैसी फसलों में अनिवार्य बदलाव की सिफारिश की गई है। सूक्ष्म सिंचाई, सौर ऊर्जा चालित ट्यूबवेल और नहरों के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया गया है। बासमती, कपास मिशन, मक्का, दालें, तिलहन, फल-सब्जी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने तथा सहकारिता आधारित उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) स्थापित करने का प्रस्ताव है।
इसके अतिरिक्त, जमीन के ठेका कानून में सुधार, डिजिटल पट्टा रजिस्ट्री, भूमिहीनों को सामुदायिक जमीन पर पट्टा, आत्महत्या पीड़ित परिवारों के लिए 10 लाख रुपये की सहायता, किसान पेंशन और कर्ज माफी योजनाओं का भी उल्लेख किया गया। खेत मजदूरों के लिए पंजीकरण और मनरेगा के दिनों को 100 से बढ़ाकर 200 करने की मांग की गई है।
कार्यक्रम में मौजूद सभी वक्ताओं ने पंजाब की इस नीति को ‘पूर्ण रूप से स्वीकार’ करते हुए इसकी सराहना की। उन्होंने पंजाब सरकार से इसे जल्द से जल्द लागू करने की पुरजोर अपील की। साथ ही, यह भी कहा कि केरल सहित अन्य राज्यों को भी अपनी स्थानीय जरूरतों के अनुसार इस नीति की कई सिफारिशों को अपनाना चाहिए।
यह कार्यक्रम ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि पंजाब का कृषि संकट अब केवल राज्य का मुद्दा न रहकर पूरे देश का संकट बन गया है। केरल जैसे सुदूर राज्य के बुद्धिजीवियों और जन-किसान नेताओं का इस मुद्दे को अपनी लड़ाई मानना इस बात का प्रमाण है कि समस्या की गंभीरता राष्ट्रीय स्तर पर महसूस की जा रही है।
