बिहार में 45 दिन की उलटी गिनती: सरकारी जमीन पर गलत जमाबंदी रद्द, संपत्ति जा सकती है
बिहार सरकार ने सरकारी भूमि पर गलत तरीके से दर्ज जमाबंदियों को रद्द करने का सख्त निर्देश दिया है, जिसके लिए 45 दिनों की समय-सीमा तय की गई है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने फर्जी और अवैध जमाबंदियों के खिलाफ विशेष अभियान चलाने का निर्णय लिया है। प्रधान सचिव सी.के. अनिल ने सभी प्रमंडलीय आयुक्तों, जिलाधिकारियों और अपर समाहर्ताओं को स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं।
इस अभियान के तहत सात श्रेणियों की सरकारी जमीनें, जो निजी व्यक्तियों के नाम पर दर्ज हो गई हैं, उनकी जमाबंदी सीधे रद्द की जाएगी। इनमें गैर मजरुआ आम, कैसरे-हिंद और खास महाल की जमीनें प्रमुख हैं। यदि किसी जमीन की विधिसम्मत बंदोबस्ती कभी नहीं हुई है, तो उसकी जमाबंदी तत्काल रद्द होगी।
इसके अतिरिक्त, जिला परिषद, नगर पंचायत, नगर निगम या ग्राम पंचायत की भूमि, राज्य सरकार के किसी विभाग, बोर्ड, निगम या बियाड़ा की भूमि, भारत सरकार के किसी मंत्रालय की भूमि, धार्मिक न्यास बोर्ड से जुड़ी भूमि, या किसी सरकारी/अर्द्ध-सरकारी मान्यता प्राप्त ट्रस्ट या गौशाला की भूमि, जिस पर गलत तरीके से जमाबंदी कायम है, वह भी जांच के दायरे में आएगी और अपर समाहर्ता उसे रद्द कर सकते हैं।
अंचल अधिकारियों को याद दिलाया गया है कि वे 3 जून 1974 से अपने-अपने अंचल की सरकारी भूमि के कलेक्टर हैं। यदि उनके कार्यकाल में सरकारी जमीन का अवैध हस्तांतरण या निजी नाम पर जमाबंदी और दाखिल-खारिज पाया गया, तो उनके खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी। अंचल अधिकारियों को पुराने राजस्व अभिलेखों की जांच कर 31 जनवरी 2026 तक अपर समाहर्ता को प्रतिवेदन सौंपना अनिवार्य होगा।
इस पूरे अभियान की निगरानी जिले के समाहर्ता (डीएम) करेंगे, ताकि सर्वे में दर्ज सरकारी जमीन की वापसी सुनिश्चित की जा सके। सरकारी जमीन की वापसी के बाद जिला और अंचल स्तर पर लैंड बैंक तैयार करने का लक्ष्य है, जिससे भविष्य में सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों के लिए भूमि उपलब्ध कराना आसान होगा। सरकार के इस फैसले से सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा और फर्जी जमाबंदी पर बड़ी चोट मानी जा रही है।
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