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26 साल पुराने मानहानि मामले में सरगुजा राजपरिवार की जीत, भाजपा नेता नंदकुमार साय को मिली राहत

By Nov 22, 2025

लगभग 26 वर्ष पूर्व, दिसंबर 1998 में, एक बहुचर्चित छात्रा की हत्या से संबंधित प्रकाशित एक विवादित रिपोर्ट के मामले में न्यायालय ने एक अखबार के मालिकों और संपादक को दोषी ठहराते हुए अर्थदंड लगाया है। इस फैसले से मध्य प्रदेश के तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार साय को भी बड़ी राहत मिली है।

न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि एक दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर में नंदकुमार साय के बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था और उसमें ऐसी बातें भी जोड़ दी गई थीं जिनका उन्होंने उल्लेख भी नहीं किया था। इस रिपोर्ट के कारण सरगुजा राजपरिवार की प्रतिष्ठा को अनावश्यक रूप से क्षति पहुंची, जिसे न्यायालय ने मानहानि का मामला माना।

प्रथम व्यवहार न्यायाधीश ने अखबार के तीन स्वामियों, तत्कालीन संपादक, प्रकाशक और मुद्रक को दोषी पाते हुए मात्र एक रुपये का अर्थदंड देने का आदेश दिया है।

ज्ञात हो कि तीन दिसंबर 1998 को अंबिकापुर के गर्ल्स कॉलेज परिसर में छात्रा प्रीति श्रीवास्तव की जीप चढ़ाकर निर्मम हत्या कर दी गई थी, जिसने उस समय पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। इस घटना के चार दिन बाद, आठ दिसंबर को अंबिकापुर के संगम चौक पर आयोजित एक सभा में, तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार साय ने राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे।

अगले दिन, उक्त अखबार में प्रकाशित समाचार में यह दावा किया गया कि इस जघन्य हत्या के आरोपी सरगुजा राजपरिवार के रिश्तेदार हैं और राजमहल के दबाव में जांच को प्रभावित किया जा रहा है। खबर में यह भी जोड़ा गया कि यदि जांच गहराई से की गई तो कई अन्य हत्याकाण्ड भी उजागर होंगे और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सरकार के आने के बाद सामंती प्रवृत्तियां सक्रिय हो गई हैं।

इन कथनों को आधार बनाकर सरगुजा राजपरिवार की ओर से न्यायालय में मानहानि का दावा दायर किया गया था। सुनवाई के दौरान, नंदकुमार साय ने अदालत को स्पष्ट किया कि उन्होंने सरगुजा राजपरिवार या महाराज एमएस सिंहदेव के विरुद्ध कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की थी और समाचार पत्र ने उनके भाषण को अपने स्तर पर बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि उन्होंने ऐसा कोई बयान दिया होता, तो वह निश्चित रूप से अन्य समाचार माध्यमों में भी प्रकाशित होता, जो कि नहीं हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रकाशित रिपोर्ट में तथ्यात्मक छेड़छाड़ की गई थी।

न्यायालय ने अपने निर्णय में इस बात की पुष्टि की कि समाचार पत्र ने भाजपा अध्यक्ष के कथनों को बढ़ाया-घटाया और अपनी टिप्पणी में ऐसे तत्व जोड़े, जिनके बोलने का कोई प्रमाण नहीं था। इस प्रकार, समाचार प्रस्तुत करने से सरगुजा राजपरिवार की छवि धूमिल हुई और यह मानहानि का एक स्पष्ट मामला बनता है।

लगभग तीन दशक बाद आया यह फैसला सरगुजा राजपरिवार के लिए एक महत्वपूर्ण जीत के रूप में देखा जा रहा है। राजपरिवार के मुखिया और पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव के लिए भी यह निर्णय राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर बड़ी राहत लेकर आया है। यह फैसला उस दौर की राजनीतिक बयानबाजी और पत्रकारिता की जिम्मेदारी पर एक गंभीर टिप्पणी के रूप में भी देखा जा रहा है।

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