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अयोध्या के जातीय मंदिर: 18वीं-19वीं सदी के ‘सबके राम’ का अद्भुत संगम

By Nov 24, 2025

राजनीतिक दल जहां जाति-समुदाय के समीकरणों में उलझे रहते हैं, वहीं अयोध्या की पावन भूमि सामाजिक समरसता का एक ऐसा अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है, जहां आस्था के आगे हर भेद मिट जाता है। अयोध्या में 18वीं और 19वीं शताब्दी के बीच स्थापित 37 ऐसे जातीय मंदिर हैं, जिनके गर्भगृह में ‘सबके राम’ विराजमान हैं। ये मंदिर न केवल ऐतिहासिक महत्व रखते हैं, बल्कि विभिन्न जातियों के लोगों के बीच प्रभु राम के प्रति समान श्रद्धा और आत्मीयता का भी प्रतीक हैं।

इन मंदिरों में निषाद वंश प्राचीन पंचायती मंदिर, राम जानकी मुराव पंचायती मंदिर और खटिक समाज पंचायती मंदिर प्रमुख हैं। इन मंदिरों की खास बात यह है कि इनके पुजारी, व्यवस्थापक और सेवादार अक्सर उसी जाति विशेष के होते हैं, जिनके लिए यह मंदिर स्थापित किया गया था। उदाहरण के लिए, टेढ़ी बाजार स्थित श्री निषाद वंश प्राचीन पंचायती मंदिर, जिसकी स्थापना वर्ष 1917 में हुई थी, निषाद समाज की समिति द्वारा संचालित है और इसके पुजारी भी निषाद समाज से ही हैं। यहां नियमित रूप से भगवान राम, जानकी जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी की आरती-पूजन और भोग लगाया जाता है।

इसी प्रकार, टेढ़ी बाजार में ही स्थित राम जानकी मुराव पंचायती मंदिर सवा सौ वर्ष से अधिक प्राचीन है। यहां के पुजारी, जो मौर्य समाज से हैं, बताते हैं कि भले ही यह मंदिर मुराव समाज का है, लेकिन भगवान तो सभी के हैं। वे अयोध्या में श्रीराम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण को एक ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहते हैं कि यह प्रभु की कृपा है और आस्था के किसी केंद्र की पांच शताब्दी बाद पुनः स्थापना विश्व के इतिहास में अद्वितीय है। उनकी श्रद्धा श्रीराम लला के मंदिर के प्रति भी उतनी ही है, जितनी इस मंदिर के प्रति, क्योंकि दोनों स्थानों पर एक ही मर्यादा पुरुषोत्तम के विग्रह प्रतिष्ठित हैं।

अयोध्या में चार हजार से अधिक मंदिर हैं, लेकिन ये 37 जातीय मंदिर एक विशेष महत्व रखते हैं। ये बताते हैं कि कैसे विभिन्न समुदायों ने सदियों से प्रभु राम को अपनी आस्था का केंद्र बनाया है और सभी ने मिलकर ‘सबके राम’ की आराधना की है। यह सामाजिक सद्भाव और धार्मिक एकता का एक ऐसा अनूठा उदाहरण है, जो आज के समय में विशेष प्रासंगिक है, जहां जातिगत विभाजन की चर्चाएं आम हैं।

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