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वारिसलीगंज में मासूमों का बचपन मजदूरी की भेंट चढ़ रहा, सरकारी दावे फेल

By Nov 23, 2025

वारिसलीगंज प्रखण्ड में बालश्रम एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है, जहाँ बच्चों को उनकी पढ़ाई-लिखाई की उम्र में ईंट-भट्ठों और होटलों में मजदूरी करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। यह स्थिति सरकारी दावों की पोल खोलती है कि बालश्रम को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।

क्षेत्र के ईंट-भट्ठों और छोटे-बड़े होटलों में बच्चों से काम लिया जा रहा है। खेलकूद और शिक्षा ग्रहण करने की उम्र के ये बच्चे ईंट भट्ठा या होटलों में मजदूरी करके अपने जीवन का अनमोल समय बर्बाद कर रहे हैं। चिंताजनक बात यह है कि इस समस्या के प्रति उनके अभिभावक भी पूरी तरह जागरूक नहीं दिखते। बाल श्रम रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारी संबंधित ईंट-भट्ठों और होटलों पर नियमित छापेमारी और सख्त कार्रवाई करने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

हाल ही में वारिसलीगंज नगर के कुछ होटलों में जो दृश्य देखने को मिला, वह सरकार के बाल श्रम उन्मूलन के दावों को झूठा साबित करता है। कई नाबालिग बच्चे होटलों में बर्तन साफ करते हुए देखे गए। वहीं, दूसरी ओर, आधा दर्जन से अधिक बच्चे ईंट भट्ठा से ट्रैक्टर पर ईंटें लोड और अनलोड करने का काम करते पाए गए। जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि आर्थिक तंगी के कारण वे अपने माता-पिता की मदद के लिए मजदूरी करने को मजबूर हैं।

इन कम उम्र के बच्चों को अक्षर ज्ञान तो है, लेकिन गरीबी उन्हें स्कूल जाने के बजाय काम करने पर मजबूर कर रही है। बच्चों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि जब वे अपने हम उम्र साथियों को स्कूल बैग टांगे विद्यालय जाते देखते हैं, तो उनके मन में भी पढ़ने-लिखने की इच्छा जागती है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं देती। अमर और सिद्धेश्वर मांझी के पुत्रों, अमर और मोहित ने बताया कि मजदूरी करना उनके लिए एक सपना बन गया है, जिसे वे पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

यह स्थिति राज्य सरकार द्वारा बाल श्रम रोकने के लिए बनाए गए कानूनों और चलाए जा रहे कार्यक्रमों पर भी सवाल खड़े करती है। सरकारी फाइलों में भले ही बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हों, लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति दयनीय है। सरकारी मुलाजिमों की मौजूदगी में भी छोटे-छोटे बच्चे होटलों, ईंट-भट्ठों और निर्माण स्थलों पर काम करते देखे जाते हैं, लेकिन अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं देते। नतीजतन, बचपन मजदूरी की भेंट चढ़ रहा है और कानून केवल किताबों के पन्नों में सिमट कर रह गया है। बाल श्रम को रोकने के लिए नियुक्त सरकारी एजेंसियां भी केवल कागजी कार्रवाई कर अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं।

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