“title”: “पराली जलाने पर सख्ती: सैटेलाइट से होगी निगरानी, दोषियों पर होगी कार्रवाई”,
“subtitle”: “कृषि विभाग ने जारी किए निर्देश, हार्वेस्टर संचालकों को मिलेगी अनुमति, किसानों को मिलेगी राहत”,
“summary”: “कृषि विभाग ने खेतों में पराली जलाने के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। अब सैटेलाइट की मदद से इसकी निगरानी की जाएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। किसानों को हार्वेस्टर चलाने के लिए अनुमति लेनी होगी, जिसमें पराली न जलाने की सहमति अनिवार्य होगी। उल्लंघन करने वाले किसानों को सरकारी योजनाओं से वंचित किया जाएगा, जबकि किसान सलाहकार और कृषि समन्वयक भी जवाबदेह होंगे।”,
“content”: “औरंगाबाद जिले में कृषि विभाग ने खेतों में पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। अब सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल कर पराली जलाने वालों की पहचान की जाएगी और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। इस संबंध में जिला कृषि पदाधिकारी संदीप राज ने कर्मियों को ई-किसान भवन अंबा में आवश्यक निर्देश दिए।nnउन्होंने स्पष्ट किया कि खेतों में हार्वेस्टर चलाने वाले संचालकों को कृषि विभाग से पूर्व अनुमति लेनी होगी। यह अनुमति तभी मिलेगी जब संचालक यह लिखित सहमति देगा कि वे किसी भी सूरत में फसल कटाई के बाद पराली नहीं जलाएंगे। यदि इसके बावजूद कोई किसान पराली जलाता पाया गया, तो उसे भविष्य में कृषि से जुड़ी सभी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित कर दिया जाएगा। पराली जलाना न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि यह कानूनी रूप से दंडनीय अपराध भी है।nnजिला कृषि पदाधिकारी ने बताया कि पटना स्थित कृषि विभाग के अधिकारी सैटेलाइट के माध्यम से पूरे जिले में पराली जलाने की गतिविधियों पर पैनी नजर रखेंगे। उन्होंने स्थानीय कर्मियों को निर्देश दिया कि यदि किसी क्षेत्र में किसान पराली जलाते हैं, तो उस क्षेत्र के किसान सलाहकार और कृषि समन्वयक के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाएगी। बिना अनुमति हार्वेस्टर चलाने वाले संचालकों पर भी एमवीआई (मोटर वाहन निरीक्षक) के माध्यम से कार्रवाई की जा सकती है।nnपराली जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटती है और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचता है। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियां फैलती हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पराली का प्रबंधन कर उससे खाद बनाई जा सकती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है।nnकिसानों द्वारा पराली जलाने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं, जिनमें मजदूरों की कमी और रबी की बुवाई के लिए खेत खाली करने की मजबूरी शामिल है। हालांकि, यह सर्वविदित है कि फसल अवशेषों को जलाने से मिट्टी की जैविक संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है।nnइस समस्या से निपटने के लिए किसानों के बीच जागरूकता फैलाना अत्यंत आवश्यक है। पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं को देखते हुए, पराली जलाने जैसी प्रथाओं पर रोक लगाना सामूहिक जिम्मेदारी है। कृषि विशेषज्ञों का जोर है कि पराली को जलाने के बजाय उसके उचित प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।”
