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उत्तराखंड में आरक्षण: दूसरे राज्यों की विवाहित SC महिलाओं को झटका, हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

By Nov 26, 2025

नैनीताल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि दूसरे राज्यों से विवाह उपरांत उत्तराखंड में निवास करने वाली अनुसूचित जाति की महिलाओं को राज्य की सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाएगा। यह निर्णय न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने अंशु सागर और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। कोर्ट ने इस सिद्धांत को रेखांकित किया कि आरक्षण का अधिकार क्षेत्र-विशिष्ट होता है और यह प्रवास के साथ स्थानांतरित नहीं होता, भले ही महिला विवाह के कारण दूसरे राज्य में बस गई हो।

मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद निवासी अंशु सागर का था, जिनका विवाह उत्तराखंड के एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति से हुआ था। जन्म से ‘जाटव’ समुदाय से होने के कारण वह उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की श्रेणी में आती हैं। उत्तराखंड में निवास और जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद उन्होंने प्राथमिक शिक्षक भर्ती में आरक्षण का दावा किया था, जिसे विभाग ने अस्वीकार कर दिया था। सरकार की ओर से दलील दी गई कि शासनादेशों के अनुसार, आरक्षण का लाभ केवल उत्तराखंड के मूल निवासियों के लिए है और पड़ोसी राज्यों के निवासी, भले ही वे उत्तराखंड से जाति प्रमाण पत्र बनवा लें, सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के हकदार नहीं होंगे। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि जाति का दर्जा जन्म से तय होता है, विवाह से नहीं।

एकलपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ‘मैरी चंद्रशेखर राव’ और ‘रंजना कुमारी बनाम उत्तराखंड राज्य’ जैसे पूर्व निर्णयों का हवाला दिया। इन निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अनुसूचित जाति-जनजाति की सूची ‘उस राज्य के संबंध में’ होती है। इसका अर्थ है कि एक राज्य में अनुसूचित जाति माना जाने वाला व्यक्ति दूसरे राज्य में स्वतः ही वह दर्जा प्राप्त नहीं कर सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रवास, चाहे वह स्वैच्छिक हो या विवाह जैसे अनैच्छिक कारणों से, किसी व्यक्ति को दूसरे राज्य में आरक्षण का अधिकार नहीं देता। यदि प्रवासियों को आरक्षण का लाभ दिया जाता है, तो यह उस राज्य के मूल अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा। एक राज्य का आरक्षित वर्ग दूसरे राज्य में सामान्य वर्ग के रूप में ही माना जाएगा, भले ही दोनों राज्यों में जाति का नाम समान हो।

इस आधार पर, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की मांग को खारिज कर दिया और उनकी याचिकाओं को निरस्त कर दिया। यह निर्णय भविष्य में अन्य राज्यों से आकर उत्तराखंड में बसने वाले उन उम्मीदवारों के लिए एक स्पष्ट नजीर प्रस्तुत करता है जो आरक्षण का दावा करते हैं।

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