उत्तराखंड में महंगी होगी शराब! वित्त और आबकारी विभाग आमने-सामने
उत्तराखंड में शराब प्रेमियों को जल्द ही अपनी जेबें अधिक ढीली करनी पड़ सकती हैं। राज्य में शराब की कीमतों पर लगने वाले वेट (वैल्यू एडेड टैक्स) की गणना के तरीके को लेकर वित्त और आबकारी विभागों के बीच गहरा मतभेद उभर कर सामने आया है। इस खींचतान का सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ने की संभावना है।
वित्त विभाग वेट की गणना के पुराने फार्मूले को दोबारा लागू करने की पैरवी कर रहा है। इस फार्मूले के तहत एक्साइज ड्यूटी और मिनिमम गारंटी ड्यूटी (MGD) को जोड़ने के बाद वेट की गणना की जाती थी, जिससे वेट की राशि बढ़ जाती थी और नतीजतन शराब की कीमतें भी बढ़ जाती थीं। वर्तमान में, वेट की गणना केवल एक्साइज ड्यूटी पर की जाती है, जिसके बाद एमजीडी जोड़ी जाती है। इस प्रक्रिया से वेट कम लगता है और शराब की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली है।
दूसरी ओर, आबकारी विभाग इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध कर रहा है। विभाग का तर्क है कि शराब की कीमतों को नियंत्रित रखने से राज्य को कुल राजस्व में 350 से 400 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ मिल रहा है। यदि वित्त विभाग के पुराने फार्मूले को अपनाया जाता है, तो वेट से केवल लगभग 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व ही प्राप्त होगा, जबकि शराब की तस्करी बढ़ने और कुल राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का खतरा है। आबकारी विभाग उत्तर प्रदेश की तर्ज पर शराब को वेट-मुक्त करने का समर्थन कर रहा है, ताकि कीमतों को स्थिर रखा जा सके और राजस्व लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके।
आबकारी विभाग राज्य के सबसे बड़े राजस्व संग्रहकर्ता विभागों में से एक है। पिछले वित्तीय वर्ष में विभाग ने 4500 करोड़ रुपये का राजस्व लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल किया था और वर्ष 2024-25 के लिए 5060 करोड़ रुपये का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। विभाग का मानना है कि कीमतों पर नियंत्रण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, यह भी सच है कि उत्तराखंड में शराब की कीमतें पड़ोसी राज्य हिमाचल से अधिक हैं, जिसके कारण हिमाचल और हरियाणा से शराब की तस्करी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इस पूरे मामले को अब मुख्य सचिव कार्यालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जहां इस नीतिगत विषय पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। आबकारी आयुक्त ने इस संबंध में पुष्टि करते हुए कहा कि यह एक नीतिगत विषय है और इस पर उच्च स्तर से निर्णय लिया जाना है। उपभोक्ताओं की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि सरकार कौन सा रास्ता चुनती है – राजस्व में वृद्धि या कीमतों पर नियंत्रण।
