उत्तराखंड में हर दिन 1800 टन कचरा: उठान और निस्तारण पर गंभीर सवाल
देहरादून। उत्तराखंड प्रदेश में हर दिन औसतन 1800 टन कचरा निकलता है, लेकिन इसके उठान और निस्तारण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कचरे की इस विशाल मात्रा के प्रबंधन में आ रही कठिनाइयां राज्य के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए एक बड़ा संकट पैदा कर रही हैं। यह चिंता ‘द देहरादून डायलाग’ के तहत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर आयोजित तीसरे व्याख्यान में जताई गई, जिसे दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर और स्पैक्स ने मिलकर आयोजित किया था।
वेस्ट वारियर्स सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने अपने वक्तव्य में बताया कि भारतवर्ष में प्रतिदिन लगभग 1.6 लाख टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इसमें से केवल 60 प्रतिशत कचरा ही संग्रहित हो पाता है, जबकि मात्र 20 से 25 प्रतिशत कचरे का ही सही ढंग से संसाधन या प्रसंस्करण किया जा पाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कचरे के इस अनियंत्रित प्रवाह को नहीं रोका गया, तो यह भविष्य में एक विकराल पर्यावरण और स्वास्थ्य संकट का रूप ले लेगा।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड में प्रतिदिन 1,600 से 1,800 टन कचरा उत्पन्न होता है। पर्वतीय भूगोल, सीमित भूमि की उपलब्धता, दुर्गम परिवहन व्यवस्था, अप्रत्याशित मौसम और पर्यटन का बढ़ता दबाव जैसे कारक यहां ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पर्वतीय शहरों में जमा हो रहे पुराने कचरे (लीगेसी वेस्ट), प्लास्टिक का बढ़ता प्रभाव और लैंडफिल पर बढ़ती निर्भरता तत्काल हस्तक्षेप की मांग करती है।
कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञों और छात्र-छात्राओं ने इस बात पर सहमति जताई कि यदि घरों, संस्थानों और बाजारों में कचरे को स्रोत स्तर पर ही 100 प्रतिशत अलग करने की व्यवस्था लागू की जाए, तो राज्य का लगभग 40 से 50 प्रतिशत कचरा स्थानीय स्तर पर ही प्रभावी ढंग से निपटाया जा सकता है। इससे न केवल निस्तारण की समस्या कम होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा। इस अवसर पर कई गणमान्य व्यक्ति और विभिन्न संस्थानों के छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
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