उत्तराखंड के उत्पादों को मिलेगी वैश्विक पहचान, जीआई टैग के लिए 100 का लक्ष्य
समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विशिष्ट उत्पादों के लिए जाना जाने वाला उत्तराखंड अब इन उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। राज्य सरकार ने अपने कृषि, उद्यानिकी और हस्तशिल्प उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेतक यानी जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) टैग दिलाने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। वर्तमान में राज्य के 29 उत्पादों को यह प्रतिष्ठित टैग मिल चुका है, और अब सरकार का लक्ष्य इस संख्या को बढ़ाकर 100 तक पहुंचाना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्य की स्थापना की रजत जयंती के अवसर पर जीआई टैग के महत्व पर जोर दिया था। इसी प्रेरणा को लेते हुए, कृषि एवं उद्यानिकी उत्पादों की पहचान और उनके विशिष्ट गुणों को संरक्षित करने के उद्देश्य से सभी जिलों से विस्तृत जानकारी मांगी गई है। यह पहल राज्य के स्थानीय उत्पादों को एक अनूठी पहचान दिलाने और उनकी ब्रांडिंग को मजबूत करने में सहायक होगी।
वर्तमान में, उत्तराखंड के 20 कृषि-औद्यानिकी और नौ हस्तशिल्प व अन्य उत्पादों को जीआई टैग प्राप्त हो चुका है। हाल ही में, बेडू और बदरी गाय घी जैसे उत्पादों को जीआई टैग मिलना एक बड़ी उपलब्धि है। इसके अलावा, 19 अन्य प्रस्ताव भी जीआई टैग की प्रक्रिया में हैं, जिनसे जल्द ही मंजूरी मिलने की उम्मीद है। जीआई टैग किसी भी उत्पाद को उसके विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ता है, जो उसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता को दर्शाता है। एक बार जीआई टैग मिल जाने के बाद, किसी अन्य उत्पाद को उस नाम का उपयोग करने की अनुमति नहीं होती, जिससे मूल उत्पादकों को विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं।
जीआई टैग प्राप्त होने के लाभ बहुआयामी हैं। यह न केवल उत्पाद को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान दिलाता है, बल्कि उसकी ब्रांडिंग और बाजार प्रतिस्पर्धा में भी महत्वपूर्ण लाभ पहुंचाता है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और उत्पादकों की आय बढ़ाने में भी एक महत्वपूर्ण कारक साबित होता है। उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद के प्रबंध निदेशक विनय कुमार के अनुसार, “राज्य के ज्यादा से ज्यादा उत्पादों को जीआई टैग हासिल हो, इसके लिए विभागों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। जिलों के मुख्य कृषि एवं उद्यान अधिकारियों से उन कृषि-औद्यानिकी उत्पादों का ब्योरा मांगा गया है, जिन्हें यह टैग दिलाया जा सकता है।”
वर्तमान में जीआई टैग प्राप्त उत्पादों में कृषि-औद्यानिकी श्रेणी में बेडू, बदरी गाय का घी, तेजपात, बासमती चावल, मुनस्यारी सफेद राजमा, कुमाऊं च्यूरा आयल, बेरीनाग चाय, मंडुवा, झंगोरा, गहथ, लाल चावल, काला भट, माल्टा, चौलाई, बुरांस शर्बत, बिच्छू बटी फेब्रिक्स, पहाड़ी तोर दाल, अल्मोड़ा लखौरी मिर्च, रामनगर-नैनीताल लीची और रामगढ़-नैनीताल आड़ू शामिल हैं। हस्तशिल्प व अन्य श्रेणी में एपण कला, रिंगाल क्राफ्ट, भोटिया दन, ताम्र उत्पाद, थुलमा, नैनीताल मोमबत्ती, कुमाऊंनी पिछौड़ा, चमोली रम्माण मुखौटा और उत्तराखंड लिखाई लकड़ी की नक्काशी शामिल हैं।
आने वाले समय में उत्तराखंड कुट्टू-फाफर, हर्षिल राजमा, जख्या, जम्बू, टिमरू, पहाड़ी मसूर, नवरंग दाल, रुद्राक्ष, पुलम, नाशपाती, काफल, किल्मोड़ा, अल्मोड़ा बाल मिठाई, अल्मोड़ा सिंगोड़ी मिठाई, नैनीताल ज्योलीकोट शहद, कौसानी चाय, गंदरायणी, नींबू और पहाड़ी आलू जैसे कई अन्य उत्पादों को भी जीआई टैग मिलने की उम्मीद है। यह पहल उत्तराखंड की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
