आतंकवाद को वैचारिक समर्थन: देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा
हाल ही में फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल से जुड़े एक आतंकी, उमर का सनसनीखेज वीडियो सामने आया है, जिसने आतंकवाद के मूल कारणों और उसके वैचारिक समर्थन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह वीडियो इस बात की पुष्टि करता है कि कैसे मजहबी कट्टरता से बुरी तरह ग्रस्त व्यक्ति आत्मघाती हमलों को भी जायज ठहरा सकता है, और यह भी दावा कर सकता है कि इस्लाम की गलत व्याख्या के तहत ऐसे कृत्यों को गलत बताया जाता है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी आतंकी ने आत्मघाती हमलों को सही ठहराने का प्रयास किया हो। विश्व भर के आतंकी संगठन ऐसे हमलों को ‘जिहाद’ का नाम देकर उसे मजहबी कृत्य के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। इसी वैचारिक समर्थन के कारण उनके आत्मघाती हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। यह वीडियो उन इस्लामी संगठनों और विद्वानों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है, जो मजहबी मान्यताओं का हवाला देते हुए आतंकवाद का विरोध करते रहे हैं और मुस्लिम युवाओं को कट्टरता से बचाने का प्रयास करते रहे हैं। अब उनका कार्य और भी कठिन हो गया है।
यह समस्या केवल आतंकी संगठनों या विद्वानों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश करती है। जहां एक ओर अशिक्षित युवाओं को कट्टरता के जाल से बचाना संभव हो सकता है, वहीं उमर जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को सही राह पर लाना अत्यंत कठिन है। ऐसे युवा इस्लामी मान्यताओं की अपनी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और उसे ही सही ठहराने पर बल देते हैं। यह सहज ही समझा जा सकता है कि उमर जैसी कट्टरता से उसके साथी भी प्रभावित होंगे।
यह सर्वविदित है कि जिहादी आतंक एक कट्टर विचारधारा की उपज है। ऐसे आतंक का मुकाबला केवल पुलिस या खुफिया एजेंसियां नहीं कर सकतीं, क्योंकि विश्व में कहीं भी वे अकेले इससे निपटने में सफल नहीं हो पाई हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि जिहादी आतंक से निपटने के तौर-तरीकों पर आम राय का अभाव है। दुर्भाग्य से, भारत में भी यही स्थिति है।
फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल के भंडाफोड़ के बाद से कई ऐसे बयान सामने आए हैं, जिनमें इस मॉड्यूल से जुड़े डाक्टरों के आतंकी बनने के लिए सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान न केवल सुरक्षा एजेंसियों के लिए मुश्किलें बढ़ाते हैं, बल्कि आतंकवाद की राह पर चलने वालों का दुस्साहस भी बढ़ाते हैं। यदि मजहबी कट्टरता से पनपे आतंकवाद का प्रभावी ढंग से सामना करना है, तो देश के राजनीतिक वर्ग को इससे निपटने के उपायों पर एक साझा राय कायम करनी ही होगी। देश की सुरक्षा के लिए ऐसे वैचारिक समर्थन का खंडन और एकजुट प्रयास अत्यंत आवश्यक है।
